भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें७१ 'धनु' राशि की कुण्डली 'मकर' राशि की कुण्डली [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), नवम भाव में धनु (९) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), दशम भाव में मकर (१०) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] १०७ १०८ 'कुम्भ' राशि की कुण्डली 'मीन' राशि की कुण्डली [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), एकादश भाव में कुम्भ (११) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), द्वादश भाव में मीन (१२) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] १०९ ११० स्थानाधिपति जातक की जन्मकुण्डली में जो राशि जिस स्थान (भाव या खाने) में स्थित होती है, उस राशि का स्वामी ग्रह ही उस स्थान भाव का अधिपति अर्थात् 'स्थाना- धिपति' होता है। जैसे—किसी कुण्डली के चतुर्थभाव में सिंह राशि (५) स्थित है तो सिंह राशि के स्वामी 'सूर्य' को ही उस स्थान अर्थात् भाव का अधिपति अर्थात् 'सुखेश' माना जायेगा, फिर चाहे वह सूर्य कुण्डली के अन्य किसी भी भाव में स्थित क्यों न हो। मान लीजिए कि वह चतुर्थभाव में न रह कर दशमभाव में बैठा है तो यह कहा जायेगा कि 'चतुर्थेश या सुखेश राज्य अर्थात् दशमभाव में चला गया है।' इसी प्रकार सब भावों, राशियों तथा ग्रहों के सम्बन्ध में समझ कर किस भाव का स्थानाधिपति कहाँ बैठा है, इसकी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। स्थानाधिपतियों के नाम विभिन्न भावों के स्वामियों को निम्नलिखित नामों से पुकारा जाता है : १. प्रथम भाव के स्वामी को—प्रथमेश, लग्नेश, देहाधीश । २. द्वितीयभाव के स्वामी को—द्वितीयेश, धनेश, द्रव्येश । ३. तृतीयभाव के स्वामी को—तृतीयेश, सहजेश, पराक्रमेश ।