भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३ 'शनि' मकर, कुम्भ, तुला, कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'राहु' मिथुन (मतान्तर से वृष) राशि पर बैठा हो, अथवा लग्न से तीसरे, छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ धनु राशि न हो। 'केतु' धनु (मतान्तर से वृश्चिक) राशि पर बैठा हो अथवा लग्न से तीसरे, छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ मिथुन राशि न हो। केन्द्र अर्थात् पहले, चौथे, सातवें एवं दसवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह विशेष शक्तिशाली होने के कारण अपना पूर्ण प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। ५. त्रिकोण अर्थात् पांचवें एवं नवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन की वृद्धि करते हैं। ६. दूसरे तथा ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन की वृद्धि करते हैं। विशेषतः ग्यारहवें भाव में बैठा हुआ प्रत्येक ग्रह विशेष लाभकारी होता है। ७. तृतीय भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के पराक्रम की बढ़ाते हैं। ८. प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम तथा एकादश भाव में बैठे हुए ग्रह उत्तम फल देते हैं। ६. षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के लिए कठिनाइयों उपस्थित करते हैं। १०. लग्न से तीसरे, छठे तथा ग्यारहवें भाव में क्रूर ग्रहों—शनि, केतु का बैठना शक्ति एवं शुभफल देने वाला होता है। ११. ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह शुभफल देते हैं। १२. आठवें तथा बारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक को थोड़ी-बहुत हानि अवश्य पहुँचाते हैं। १३. जिस भाव का जो ग्रह कारक माना गया है, वह यदि अकेला उसी भाव में बैठा हो तो उस भाव को बिगाड़ देता है। १४. जिस भाव का स्वामी उच्च राशिस्थ, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री अथवा मूल त्रिकोण स्थित होता है, उस भाव का शुभ फल प्राप्त होता है। १५. जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो, उसका फल उत्तम होता है तथा जिसमें पाप ग्रह बैठा हो, उसके शुभ फल की हानि पहुँचती है। १६. जो ग्रह सूर्ये के बराबर अथवा उमके निकटवर्ती अंशों पर होता है, उसे 'पूर्ण अस्त' माना जाता है। जो ग्रह सूर्य से ८ अंश की दूरी पर होता है, उसे 'आधा अस्त' माना जाता है तथा जो ग्रह सूर्य के 15 अंश की दूरी पर होता है उसे 'पूर्ण उदय'. माना जाता है।