भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१ ११८ में वर्णित फलादेश रूपी प्रभाव भी तब तक डालता रहेगा, जब तक कि वह गोचर में उस राशि से हट कर आगे कर्क राशि में नही चला जाता। कर्क राशि में पहुँच कर उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६ के अनुसार प्रभाव डाल उठेगा। इसी प्रकार गोचर की सब राशियों तथा उसके ग्रहों के अस्थायी-फलादेश के विषय में समझ लेना चाहिए। उक्त विधि के प्रत्येक ग्रह के स्वामी तथा अस्थायी प्रभाव को जानकर, उसके समन्वय स्वरूप जो निष्कर्ष निकलता हो, उसी को अपने वर्तमान काल का यथार्थ फलादेश समझना चाहिए। गोचर के आधार पर किस ग्रह का फलादेश किस उदा- हरण-कुण्डली में देखा जाय, इसका निर्देश प्रत्येक लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों के आरम्भ में यथास्थान किया गया है। स्मरणीय है कि इस ग्रंथ में प्रदर्शित प्रत्येक लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों में विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का वर्णन अलग-अलग किया गया है, अतः प्रत्येक जन्मकुण्डली का फलादेश ज्ञात करने के लिए ६ उदाहरण-कुण्डलियों के अध्ययन की आवश्यकता पड़ेगी। यही नियम गोचर कुण्डली के फलादेश पर भी लागू होगा। यदि लग्न कुण्डली के किसी भाव में दो या उससे अधिक ग्रह एक साथ बैठे हों तो उसके विशिष्ट प्रभाव को 'ग्रहों' की युति, सम्बन्धी वाले तृतीय खण्ड में देखना चाहिए। स्मरणीय है कि जो ग्रह जितने अंश का होता है, उसी के अनुरूप वह न्यूनाधिक फल प्रदान करता है। अतः ग्रहों के अंशों की जानकारी रखना भी आवश्यक है। यह जानकारी पंचांग अथवा किसी ज्योतिषी द्वारा प्राप्त की जा सकती है। उक्त विधि से इस पुस्तक द्वारा संसार के किसी भी स्त्री-पुरुष की जन्म कुण्डली का फलादेश ज्ञात किया जा सकता है। यदि ग्रंथ में वर्णित किसी विषय को समझने में कोई कठिनाई हो अथवा जन्मपत्र-निर्माण आदि ज्योतिष सम्बन्धी भी कोई जानकारी प्राप्त करनी हो तो जवाबी-पत्र लिख कर निम्न पते पर पूछताछ की जा सकती है। पता यह है— पं० राजेश दीक्षित, कृष्णापुरी, मथुरा (उ० प्र०)