भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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६० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में स्वक्षेत्री सूर्य के प्रभाव से जातक बड़ा विद्वान्, बुद्धिमान्, यशस्वी तथा सन्तान-सुख से परि- पूर्ण रहेगा। यहाँ से सूर्य की सप्तम दृष्टि अपने शत्रु शनि की राशि वाले ग्यारहवें भाव पर पड़ती है, अतः आय के साधनों में रुकावटें आती रहेंगी तथा आर्थिक लाभ के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा। इस ग्रह स्थिति का जातक कटुभाषी तथा अह- कारी होता है, जिसके कारण लोग परोक्ष में उसकी निन्दा भी करते हैं। १२० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश छठे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर निरन्तर विजय प्राप्त करता रहेगा। पंचमभाव का स्वामी षष्ठभाव मेष लग्न : षष्ठभाव : सूर्य में होने के कारण विद्याध्ययन में कुछ कठिनाइयां तो आयेंगी, परन्तु जातक परम विद्वान् तथा बुद्धिमान भी होगा। सूर्य की सप्तदृष्टि व्ययस्थान में पड़ने के कारण जातक बाहरी संबंधों से लाभ एवं सफलता पाने वाला, विदेशों में सम्मानित तथा अधिक खर्च करने वाला भी होगा। इसे सन्तानपक्ष से कुछ चिन्ताएं अवश्य बनी रहेंगी। शत्रुपक्ष कठिनाइयां खड़ी करता रहेगा, परन्तु यह हारेगा तो। १२१ 'मेष' लग्न कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने स्वास्थ्य एवं स्त्री के विषय में निरन्तर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। सप्तम उच्चदृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले लग्नभाव को देखने के कारण जातक लंबे कद का तेजस्वी तथा स्वाभिमानी होगा। वह युक्ति एवं बुद्धिबल से अपना काम निकालने में प्रवीण होगा। सूर्य के पंचमेश होने के कारण जातक का विद्या तथा सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहेगा तथा जीवन-यापन के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहेंगी। १२२