भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

६१ 'मेष' लग्न कुण्डली से 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व एवं गुप्त धन सम्बन्धी लाभ तो होगा परन्तु आठवाँ घर मृत्यु-भवन होने से विद्या एवं संतान पक्ष में कमजोरी रहेगी । दैनिक जीवन में भी कठिनाइयाँ आती रहेंगी । सातवीं दृष्टि से शत्रु के द्वितीय भाव को देखने के कारण जातक को धन एवं कुटुम्ब विषयक असन्तोष भी निरन्तर बना रहेगा । कुल मिलाकर जीवन संघर्षपूर्ण रहेगा । 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : नवमभाव : सूर्य नववें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक श्रेष्ठ विद्या, बुद्धि एवं ज्ञान का स्वामी होगा । यह धर्म, धर्मज्ञ शास्त्रों का ज्ञाता, ईश्वर भक्त, यशस्वी, भाग्यवान, दयालु, दानी तथा तीर्थसेवी भी होगा । भाग्योन्नति के क्षेत्र में निरन्तर, सफलताएँ मिलती रहेंगी । सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि वाले तृतीय भाव को देखने के कारण जातक के परा- क्रम, भाई-बहन, साहस तथा योग्यताओं में वृद्धि होगी । सूर्य की यह स्थिति बहुत श्रेष्ठ है । 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने पिता, व्यव- साय, राज्य नौकरी तथा प्रतिष्ठा के क्षेत्र में कुछ कमियों शिकार होना पड़ता है, परन्तु यह विदेशी भाषा एवं का राजभाषा का श्रेष्ठ जानकार होता है । सातवीं दृष्टि से अपने मित्र चन्द्रमा की राशि से चौथे भाव को देखने से माता, भूमि, भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है । ऐसा जातक अपने बुद्धिबल से राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है ।

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक) · पृष्ठ 84, कुल 638 में से · BharatKosha