भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 638 में से

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६२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अर्थ-लाभ के लिए विशेष परिश्रम तो करना पड़ता है, परन्तु लाभ भी अत्यधिक होता है। ग्यारहवें भाव में पापग्रह शक्तिशाली माना जाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले पञ्चमभाव से देखने के कारण जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान का भी विशेष लाभ होता है। ऐसा जातक अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए कटुभाषी भी होता है तथा उसी से लाभ भी उठाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध होता है, परन्तु व्यय की अधिकता भी बनी रहती है। उसे अपना खर्च चलाने के लिए बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना पड़ता है। सन्तान एवं विद्या पक्ष की हानि तथा चिन्ता के योग भी उपस्थित होते हैं। सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि वाले षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष पर विजय प्राप्त होती है, परन्तु वह मानसिक चिंताओं का शिकार भी बना रहता है। 'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक मानसिक तथा पारिवारिक सुख-शांति प्राप्त करता है। सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने के कारण स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक का दाम्पत्य-जीवन सुखी तथा शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

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