भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१०० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश 'मेष' लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शनि की राशिस्थ मंगल के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती रहती है, परन्तु अष्टमेश दोष होने के कारण कुछ कठिनाइयां भी आती हैं। चौथी दृष्टि से शत्रु की राशि वाले द्वितीयभाव में देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब सम्बन्धी असन्तोष रहता है। सातवीं दृष्टि से मित्रराशि के पञ्चमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर प्रभाव बढ़ता है तथा जातक बड़ा साहसी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों में भ्रमण करने वाला तथा अत्यधिक खर्च करने वाला होता है। उसके शारीरिक सौंदर्य में भी कमी रहती है। चौथी मित्र दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण जातक पराक्रमी होता है, परन्तु मंगल के अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिनों के सुख में कमी आ जाती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से छठे भाव को देखने के कारण जातक शत्रु पक्ष में प्रबल रहता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने से स्त्री-सुख में कमी आती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहती हैं। 'मेष' लग्न में 'बुध' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक पुरुषार्थी होता है, परन्तु बुध के षष्ठेश दोष के कारण रोग-पीड़ित भी रहता है। इसी कारण भाई-बहिनों के सुख में भी कुछ कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सातवें भाव को देखने के कारण व्यवसाय के क्षेत्र में तो परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु स्त्री-सुख में कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिल पाती है।