भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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१०१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक के धन एवं पुरुषार्थ में वृद्धि तो होती है, परन्तु बुध के अष्टमेश होने के कारण धनप्राप्ति के क्षेत्र में कठिनाइयों तथा हानि का सामना भी करना पड़ता है। बुध के तृतीयेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में भी कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव की देखने के कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे पुरातत्त्व सम्बन्धी लाभ भी होते हैं। १५३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक अत्यन्त पराक्रमी तथा हिम्मती होता है, परन्तु षष्ठेश होने के कारण जहाँ शत्रुओं पर विजय दिलाता है, वहीं भाई-बहिन के सुख में कमी भी ले आता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक अपने ही पराक्रम से भाग्य की वृद्धि करता है तथा कुछ कमी के साथ धर्म-पालन की ओर भी प्रेरित करता रहेगा। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक विवेकी, परिश्रमी तथा पराक्रमी होता है। १५४ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा सुख के पक्ष में कुछ कमियां बनी रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव की देखने के कारण जातक को पिता एवं राज्य पक्ष द्वारा सम्मान तथा सफलतायें मिलती हैं। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक यशस्वी होता है तथा प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता प्राप्त करता है। १५५

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