भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

१०२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्रराशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक अपने विशेष परिश्रम द्वारा विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है, क्योंकि बुध में स्थानाधिपति दोष है। सातवीं मित्रदृष्टि से ग्यारहवें भाव को देखने के कारण जातक अपने बुद्धि-विवेक द्वारा भाग्य तथा आय की वृद्धि करता है। बुध के षष्ठेश होने के कारण जातक को शत्रुपक्ष में भी सफलता मिलती रहती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेष लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में स्वक्षेत्री तथा उच्च के बुध के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव रखने वाला तथा अपने पुरुषार्थ द्वारा बड़े-बड़े काम कर दिखाने वाला होता है। बुध के पराक्रमेश के साथ षष्ठेश भी होने के कारण भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा अपने पराक्रम के बारे में भी कुछ आन्तरिक कमी का अनुभव करता रहता है। सातवीं नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने के कारण जातक को खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों में कुछ हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय में सफलता पाता है, परन्तु षष्ठेश होने के कारण स्त्री-पक्ष में कठिनाइयां आती रहती हैं। सातवीं दृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को सामान्य शारीरिक कष्ट तथा रोगों का शिकार भी बनाता है। भाई-बहिन के द्वारा जातक को सहयोग मिलता रहता है तथा विवेक-बुद्धि भी प्रबल रहती है।