भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि में स्थित तृतीयेश एवं षष्ठेश बुध के प्रभाव से जातक को पराक्रम, आयु तथा पुरातत्त्व के सम्बन्ध में कठिनाइयां आती हैं तथा शत्रुपक्ष से हानि पहुँचने की संभावना भी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से बुध द्वितीयभाव से देखता है, अतः जातक को धन उपार्जित करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह स्थिति के जातक का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित षष्ठेश बुध के कारण जातक की भाग्य-पक्ष में कठिनाइयों का अनुभव होता है, परन्तु शत्रुपक्ष के सम्बन्ध से भाग्यवृद्धि में सफलता भी मिलती है। सातवीं दृष्टि से बुध स्वराशि में तृतीयभाव को देखता है, अतः जातक का पराक्रम बढ़ा रहता है और उसे स्व-विवेक तथा भाई-बहिनों द्वारा लाभ प्राप्त होता रहता है। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक कुछ परेशानियों के साथ ही उन्नति कर पाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक अपने पराक्रम तथा पुरुषार्थ द्वारा अत्यधिक उन्नति करता है, परन्तु बुध के षष्ठेश होने के कारण पिता से कुछ वैमनस्य भी रहता है। राज्यपक्ष में सम्मान तथा शत्रुपक्ष में सफलता प्राप्त होती है। सातवीं शत्रु दृष्टि से बुध चन्द्रमा की राशि के चौथे भाव को देखता है, अतः माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी ला देता है।