भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
६४६ अमर योग यदि सभी पापग्रह केन्द्र में हों, अथवा सभी शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो इन दोनों प्रकार से अमर योग बनता है। पापग्रहों के अमर योग में जन्म लेने वाला जातक क्रूर-स्वभावी राजा तथा शुभ ग्रहों के अमर योग में जन्म लेने वाला जातक सौम्य-स्वभावी राजा होता है। [कुण्डली १६३२] एकावली योग लग्न अथवा किसी भी भाव से आरम्भ करके क्रमशः सातभावों में सात ग्रह स्थित हों, तो ऐसा जातक महाराजा होता है। [कुण्डली १६३३] द्वितीय हंस-योग सभी ग्रह मेष, कुम्भ, धनु, तुला, मकर तथा वृश्चिक राशि में हों, तो ऐसा व्यक्ति राजा अथवा राजपूजित एवं सब प्रकार के ऐश्वर्यों का स्वामी होता है। [कुण्डली १६३४]
६४७ पंचधा मैत्री-चक्र
| सूर्य | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अधिमित्र | चन्द्र, मंगल | सूर्य, बुध | सूर्य, चन्द्र | शुक्र, चन्द्र | बुध | ||
| मित्र | गुरु | मंगल, शुक्र | शनि | शनि | गुरु | ||
| सम | शुक्र | गुरु, बुध | सूर्य, मंगल | शुक्र, चन्द्र, मंगल | सूर्य, चन्द्र, शनि | बुध, मंगल, शुक्र | |
| शत्रु | बुध | गुरु, शनि | शुक्र | गुरु, शनि | मंगल, बुध | ||
| अधिशत्रु | शनि | बुध, शुक्र | सूर्य, चन्द्र | ||||
| कुण्डली चक्र (तुला लग्न - ७): |
- प्रथम भाव (तनु): ७
- द्वितीय भाव (धन): ८
- तृतीय भाव (सहज): ९
- चतुर्थ भाव (सुख): १०
- पञ्चम भाव (सुत): ११
- षष्ठ भाव (रिपु): १२
- सप्तम भाव (जाया): १
- अष्टम भाव (आयु): २
- नवम भाव (भाग्य): ३
- दशम भाव (कर्म): ४
- एकादश भाव (लाभ): ५
- द्वादश भाव (व्यय): ६ १६३५
सम्पूर्ण 1635 कुण्डलियों से युक्त भृगु-संहिता फलित-दर्पण (फलित-प्रकाश) Bhrigu-Sanhita Phalit-Darpan (Phalit-Prakash)