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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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निसन्देह उपर्युक्त लोक गीतों के उपस्थित किये गये उदाहरण यह सिद्ध करेंगे कि लोक गीतों में कल्पना की विशद उड़ान नहीं, संगीत का शास्त्रीय विधान नहीं, न छंद के कृत्रिम मानों का आग्रह नहीं, है केवल साधारण शब्दों में अन्तर्दशा की गहन स्वाभाविक और मार्मिक अभिव्यक्ति । लेकिन यदि कला रागिक भावों की आवेगपूर्ण अभिव्यक्ति है तो ये लोक गीत निश्चय ही कलात्मक हैं । उनमें भावना और संगीतात्मकता का समन्वय है । छंदों में चूंकि वृत्तों की यतिबद्धता ही उनके आन्तरिक लय को स्थिरता प्रदान करती है इसलिये छन्द शास्त्रियों ने प्रत्येक छन्द के लिये कितनी मात्राओं के पश्चात् यति आवश्यक है इसका निर्देश कर दिया है । इसके विपरीत संगीत के हेतु रचे गये पदों और लोकगीतों में यति-निर्धारण का नियम लागू नहीं होता वहाँ 'स्वरसम' का नियम ही सामान्यतया स्वीकृत हुआ है । बीसलदेव रासो के रचयिता ने भी 'स्वरसम' के नियम को ही सम्भवतः स्वीकार किया है, और यही कारण है। कि यद्यपि बीसलदेव रासो के छन्दों में यतिबद्धता का अभाव है फिर भी वे गेय हैं । काव्य के कृत्रिम मानों के अभाव और शास्त्रीय संगीत के विधानों की अनियमितता के कारण ही शायद पं० मोतीलाल जी मेनारिया ने कहा है कि "बीसलदेव रासो गीतकाव्य नहीं है । राजस्थान में यह कभी गाया नहीं गया, न आज गाया जाता है और न इसमें गीतकाव्य के कोई लक्षण मिलते हैं । गीतकाव्य की भाषा में जो चञ्चलतापन, छन्दों में जो गति, शब्दों में जो मर्म- स्पर्शिता और विषय में जो ऐकप्रियता होनी चाहिये वह इसमें नहीं है ।"१ लेकिन वृत्त और संगीत का जो मूल भेद ऊपर बताया गया है उस० अनुसार तो रासो की गेयता में संदेह प्रकट करना उचित नहीं । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा 'रघुनाथ रूपक गीतारो' में वर्णित गीतकाव्य के लक्षणों के बीसलदेव रासो के पदों में प्राप्त न होने के कारण यदि इसकी गेयता में प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है तब यह कहना पड़ेगा कि 'गीतकाव्य' और 'गीत' का अन्तर समझने का प्रयत्न नहीं किया गया है । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा 'रघुनाथ रूपक गीतारौ' दोनों लक्षण ग्रन्थ हैं जिनमें 'गीत' छंद के लक्षणों का वर्णन है । बीसलदेव रासो 'लोक गीत' है इसलिए इसमें 'गीत' छंद के लक्षण नहीं प्राप्त होते । अब रही बात इसकी भाषा में चञ्चलतापन, शब्दों में मर्मस्पर्शिता

१—राजस्थानी भाषा और साहित्य—पृ० ८७ ।