बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- १३' - घाम चल्या छा भँवर जी ! पोपली जी, राँणी ढोला ! हो गयी घेर घुमेर । बैठौँ की रुत चाल्या चाकरी जी, ओजी म्हौरा सास सपूती रा पूत । मवना सिधारो पूरब को चाकरी जी ॥ [ गुजरात की कोई कन्या ससुराल जा रही है और कहती है— अमे रे लील़ा वननी चरकलड़ी उड़ो जाशुँ परदेश जी । आज रे दादाजीना देशमाँ काले जाशुँ परदेश जी ॥ [ बिहार युक्तप्रान्त और मध्यप्रान्त में आइये, कहीं सुहाग की रात है और आनन्द में मग्न वधू गा रही है— आज सोहाग कै रात चन्दा तुम उइहौ । चन्दा तुम उइहौ सुरुज मति चइहौ ॥ मोर हिरदा बिरस जनि किहेउ सुरुग मति बोलेउ । मोर छतिया बिहरि जनि जाइ तू पह जिनि फाटेउ ॥ ' आजु करहु बड़ी राति चन्दा तुम उइहौ । धीरे धीरे चलि भोग सुरुज बिलम करि अइहौ ॥ [ अथवा 'मेघदूत' के संदेशवाहक मेघों की भांति विरहिणी का बादलों द्वारा पिया के पास संदेश भेजना कितना हृदयस्पर्शी है— कारिक पियरि बदरिया झिमिकि दैय बरसहु । बद्रो जाइ बरसहु उही देस जहाँ पिया फोड़ करै ॥ भीजै आरार बादर सम्भुआ कनकिया । अरे भितराँ से हुलसै करेज समुझि घर आवै' ॥ और इन्हीं लोक गीतों के सदृश बीसलदेव रासो के भी पद हैं । रानी राजमती उलग ( परदेश ) जाते हुए अपने पति से विनय करती है कि वह भी उनके साथ चलेगी । एकाकी रहना उसके लिये दुसहं है— हउ न पवीजुं राजा थाकी से बात । साधान चालिस्यइ राइ कइ साथ । बादली हुइ करि वापरउं ! पाघत सार सिस्वाड डोलिस्या बाइ ॥ उभी पहरइ जागिसिउ । अण परि सेविश्यउ आपणउ राय ॥--( पद संख्या ६२-)