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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
  • १३' - घाम चल्या छा भँवर जी ! पोपली जी, राँणी ढोला ! हो गयी घेर घुमेर । बैठौँ की रुत चाल्या चाकरी जी, ओजी म्हौरा सास सपूती रा पूत । मवना सिधारो पूरब को चाकरी जी ॥ [ गुजरात की कोई कन्या ससुराल जा रही है और कहती है— अमे रे लील़ा वननी चरकलड़ी उड़ो जाशुँ परदेश जी । आज रे दादाजीना देशमाँ काले जाशुँ परदेश जी ॥ [ बिहार युक्तप्रान्त और मध्यप्रान्त में आइये, कहीं सुहाग की रात है और आनन्द में मग्न वधू गा रही है— आज सोहाग कै रात चन्दा तुम उइहौ । चन्दा तुम उइहौ सुरुज मति चइहौ ॥ मोर हिरदा बिरस जनि किहेउ सुरुग मति बोलेउ । मोर छतिया बिहरि जनि जाइ तू पह जिनि फाटेउ ॥ ' आजु करहु बड़ी राति चन्दा तुम उइहौ । धीरे धीरे चलि भोग सुरुज बिलम करि अइहौ ॥ [ अथवा 'मेघदूत' के संदेशवाहक मेघों की भांति विरहिणी का बादलों द्वारा पिया के पास संदेश भेजना कितना हृदयस्पर्शी है— कारिक पियरि बदरिया झिमिकि दैय बरसहु । बद्रो जाइ बरसहु उही देस जहाँ पिया फोड़ करै ॥ भीजै आरार बादर सम्भुआ कनकिया । अरे भितराँ से हुलसै करेज समुझि घर आवै' ॥ और इन्हीं लोक गीतों के सदृश बीसलदेव रासो के भी पद हैं । रानी राजमती उलग ( परदेश ) जाते हुए अपने पति से विनय करती है कि वह भी उनके साथ चलेगी । एकाकी रहना उसके लिये दुसहं है— हउ न पवीजुं राजा थाकी से बात । साधान चालिस्यइ राइ कइ साथ । बादली हुइ करि वापरउं ! पाघत सार सिस्वाड डोलिस्या बाइ ॥ उभी पहरइ जागिसिउ । अण परि सेविश्यउ आपणउ राय ॥--( पद संख्या ६२-)
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निसन्देह उपर्युक्त लोक गीतों के उपस्थित किये गये उदाहरण यह सिद्ध करेंगे कि लोक गीतों में कल्पना की विशद उड़ान नहीं, संगीत का शास्त्रीय विधान नहीं, न छंद के कृत्रिम मानों का आग्रह नहीं, है केवल साधारण शब्दों में अन्तर्दशा की गहन स्वाभाविक और मार्मिक अभिव्यक्ति । लेकिन यदि कला रागिक भावों की आवेगपूर्ण अभिव्यक्ति है तो ये लोक गीत निश्चय ही कलात्मक हैं । उनमें भावना और संगीतात्मकता का समन्वय है । छंदों में चूंकि वृत्तों की यतिबद्धता ही उनके आन्तरिक लय को स्थिरता प्रदान करती है इसलिये छन्द शास्त्रियों ने प्रत्येक छन्द के लिये कितनी मात्राओं के पश्चात् यति आवश्यक है इसका निर्देश कर दिया है । इसके विपरीत संगीत के हेतु रचे गये पदों और लोकगीतों में यति-निर्धारण का नियम लागू नहीं होता वहाँ 'स्वरसम' का नियम ही सामान्यतया स्वीकृत हुआ है । बीसलदेव रासो के रचयिता ने भी 'स्वरसम' के नियम को ही सम्भवतः स्वीकार किया है, और यही कारण है। कि यद्यपि बीसलदेव रासो के छन्दों में यतिबद्धता का अभाव है फिर भी वे गेय हैं । काव्य के कृत्रिम मानों के अभाव और शास्त्रीय संगीत के विधानों की अनियमितता के कारण ही शायद पं० मोतीलाल जी मेनारिया ने कहा है कि "बीसलदेव रासो गीतकाव्य नहीं है । राजस्थान में यह कभी गाया नहीं गया, न आज गाया जाता है और न इसमें गीतकाव्य के कोई लक्षण मिलते हैं । गीतकाव्य की भाषा में जो चञ्चलतापन, छन्दों में जो गति, शब्दों में जो मर्म- स्पर्शिता और विषय में जो ऐकप्रियता होनी चाहिये वह इसमें नहीं है ।"१ लेकिन वृत्त और संगीत का जो मूल भेद ऊपर बताया गया है उस० अनुसार तो रासो की गेयता में संदेह प्रकट करना उचित नहीं । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा 'रघुनाथ रूपक गीतारो' में वर्णित गीतकाव्य के लक्षणों के बीसलदेव रासो के पदों में प्राप्त न होने के कारण यदि इसकी गेयता में प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है तब यह कहना पड़ेगा कि 'गीतकाव्य' और 'गीत' का अन्तर समझने का प्रयत्न नहीं किया गया है । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा 'रघुनाथ रूपक गीतारौ' दोनों लक्षण ग्रन्थ हैं जिनमें 'गीत' छंद के लक्षणों का वर्णन है । बीसलदेव रासो 'लोक गीत' है इसलिए इसमें 'गीत' छंद के लक्षण नहीं प्राप्त होते । अब रही बात इसकी भाषा में चञ्चलतापन, शब्दों में मर्मस्पर्शिता

१—राजस्थानी भाषा और साहित्य—पृ० ८७ ।

तथा विषय में लोकप्रियता के प्रभाव ही । इसके लिये तो यही कहना पर्याप्त होगा कि इसकी प्राचीनतम प्रति जो प्राप्त मात्र है वह १६३३ की है। और और इसका रचनाकाल यदि ११ वीं या १२ वीं शताब्दी का माना जाय जैसा कि अनेक कारणों से मानना पड़ता है तब तो यह कहना ही पड़ेगा कि भाषा में अलबेलापन, शब्दों में मनोहरिता और विषय में लोकप्रियता के कारण ही यह चार सौ वर्षों पश्चात् लेखबद्ध हुआ । भाषा यह ठीक है कि आज की प्राचीनतम हस्तलिखित प्रति हमें यह सोचने के लिये बाध्य करती है कि यह ग्रन्थ कई शताब्दियों तक मौखिक रहा फिर भी इसी प्राचीनतम प्रति की भाषा के अन्य रूपक में छिपी हुई प्राचीनता ११ वीं शताब्दी की भाषा का परिचय देती है। यहाँ वि० सं० १६३३ वाली हस्त- लिखित प्रति से प्राप्त भाषा का संक्षिप्त व्याकरण इसलिये उपस्थित किया जा रहा है कि इसके द्वारा ग्रन्थ के रचना-काल की भाषा पर कुछ प्रकाश पड़ सके— उच्चारण [१] ग्रन्थ में तालव्य 'श' और मूर्द्धन्य 'ष' का प्रयोग नहीं हुआ है । 'ष' का प्रयोग 'ख' के रूप में हुआ है— पाष          खान पाष          खाज षेह          खेद पाषड         खाडड 'खारा' पडक्षि         पडक्ति ( खौरि )—इत्यादि । [२] वर्णमाला के अक्षर 'ऋ' और 'ऌ' का प्रयोग शब्दों के साथ नहीं है। मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग शब्दों के अन्त तथा मध्य में दन्त्य 'न' के स्थान पर बराबर हुआ है। दन्त्य 'न' से प्रारम्भ होने वाले शब्दो में मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग नहीं हुआ है— पाहण          पाहन भणइँ          भनई गिणइँ          गिनई

  • ३५: - माणियो भानियो वयणु वयन मागिण मागिन मयण गयन गिण गिन, इत्यादि। [३] अपभ्रंश की भाँति संज्ञाओं के अन्त में 'ड़ा', 'ड़ी' और 'ड' का प्रयोग मिलता है। गूजड़ा सेसड़ी मुदड़ी गोहड़ी राएड़ी चूनड़ी दुप्पटी भापड़ी हठवट पतरंड इत्यादि। दोयट कारक बीसलदेव रासो की १६३३ वाली प्रति में विभक्तियों की दशा बड़ी विचित्र है। डिंगल में प्रयुक्त होने वाली विभक्तियाँ जो प्रायः व्यवहार में लायी गयी हैं उसका प्रधान कारण 'रासो' का १७ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा जाना ज्ञात होता है। डिंगल में कारक दो प्रकार से व्यक्त किये जाते हैं। एक प्रकार वह है जिसमें शब्दों के साथ विभक्तियों का प्रयोग होता है और दूसरा प्रकार यह है जिसमें शब्दों के साथ पार्सर्ग ( Post position ) का व्यवहार किया जाता है। रासो में इन दोनों प्रकारों का प्रयोग हुआ है। दोनों प्रकारों के प्रयोगों का उदाहरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है :- १. विभक्ति के साथ- प्रथमा-राइ, गोरि, गोरदि, पंडइ, जोयिनऊ। द्वितीया-मुंपिउठ, पतउठ, पीवउठ, सीसउठ, औपयठ, कंपउ। तृतीया-हस्ते, राइ, मुखि, हुपि, दिठि। चतुर्थी-अजमेरि। पञ्चमी- ÷ षष्ठी-सुरगह, सुरह, वनह, जोवनह। सप्तमी-अजमेरि, उळगइ, तनहि, सिरि, घरि, दुवारि, देसि, मनि। अष्टमी (सम्बोधन)-पंडिया, बालमदेव, गोरी, रणी- इत्यादि।
  • ३७ - २. परसर्ग के साथ- कर्त्ता- + कर्म - माधवह, राणीमह, जोगीमह, राजमतीनह, गोरीनह । करण-जाणिवरि, माथासा, पुरुषसिउ, स्वामी सिऊ, घरतीरथं । सम्प्रदान- + अपादान-गउदते, फलाने । सम्बन्ध-गवरका, उसगाणा की, भोजकह, सयाणायण्ड, 'बुद्धइव', जेसद्ध- जेसळमेररी', अजमेरा कयह । अधिकरण-मनमाहे, राजमाहि, परटेमह पर, पगे मो । सम्बोधन- हे हिरणीय, हे अभया, हे घण-इत्यादि । सर्वनाम पुरुष वाचक प्रथम पुरुष द्वितीय पुरुष तृतीय पुरुष कर्त्ता म्है, म्हा तुम्हे, तू, ये, तउ उस, उव, सो कर्म म्हारू, हमि, म्दानह, तोहि, तोन, तूनह, उनवि, उणनह, म्हारह, म्हारूह, तूहेह, तउ, तुमही तिहा, तिणह मोनह, मोह सोइ करण म्हा, स, हमस्यं तुम्हस, तं विणि सं, तिणासां सम्प्रदान + + + अपादान + + + सम्बन्ध म्हारी, म्हाकह, मउ, थारइ, धारउ, थारी, तिणि, उयारह मो, म्हारइ, माका, थारा, तिस, तोरो, म्हारउ, म्हारीय, म्हा, थाकउ, तुझ, तोरीं म्हारी, मुधि, म्हाका, म्हारा, मोरा अधिकरण + + -इत्यादि । अन्य सर्वनाम 'कोई' (अनिश्चय वाचक) 'जे' (सम्बन्ध वाचक) 'यह' (निश्चय वाचक) 'किसउ' (सर्वनामिक विशेषण) 'जउ' (सम्बन्ध वाचक) 'सो' (सम्बन्ध वाचक)
  • ४८ - 'जिरा' (सम्बन्ध वाचक) 'काहू' (प्रश्नवाचक 'कह' (प्रश्नवाचक) 'सउ' (सार्वनामिक विशेषण), 'किह' (प्रश्नवाचक) 'कियकड' (अनिश्चयवाचक), 'कठ' (प्रश्नवाचक) 'ताहू' (अनिश्चयवाचक), 'समी' सार्वनामिक विशेषण) 'वसौ' (निश्चयवाचक) 'ए' (निश्चयवाचक) 'कवण' (प्रश्नवाचक), 'ते' (सम्बन्धवाचक बहुवचन) 'एह' (निश्चयवाचक) 'कुण' (प्रश्नवाचक)-इत्यादि । अव्यय जिमि-जैसे । किम-कैसे । जाणि-मानों । कइ—या, अथवा जैसा-जैसा । किसी-कैसी । तबइ-तब । इव-इस प्रकार तब—तब । सदि-साथ । किसो परि किस प्रकार । क-कैसे । सम—समान अरु—और : क्रिया वर्तमान काल कारक की भाँति क्रियाओं का रूप भी बीसलदेव रासो में प्राय डिंगल का वही है । हिन्दी में वर्तमानकालिक क्रिया के साथ जिस अर्थ में 'है' का प्रयोग होता है डिंगल में उसी अर्थ में प्रायः 'छह' प्रयुक्त होता है । रासो में है के अर्थ में 'छह' का प्रयोग प्रायः बर्त्तमान काल की क्रिया के अन्य पुरुष में पाया जाता है । अन्य पुरुष—बोलावइ छह, वाजइ छह, दीजइ छह, बहठी छह, वरसइ छह, मेलइ, मोडर छह—इत्यादि । वर्तमान काल की क्रिया में है के अर्थ में 'छह' के तथा उकारान्त प्रयोग के अतिरिक्त अपभ्रंश के क्रिया पद 'इकारान्त' का भी प्रयोग अनेक स्थलों पर इस काव्य में किया गया है । एक वचन बहु वचन अन्य पुरुष—छहजइ, भजइ, गिणइ, कहइ, गाइ, चितवइ, + जाइ उच्चरइ, पुच्छइ, नाणइ, बोलावइ, हसाइइ, वरिसइ, इत्यादि । मध्यम पुरुष—धरउ, जाउ, जाणउ, सबहउ—इत्यादि + प्रथम पुरुष—वीनवउ, मणवउ, गरजूं, पडउ, छागू, अयउ, बहउ— इत्यादि । + भूतकाल भूतकालिक क्रियाओं में डिंगल में मूल क्रिया के पीछे 'इउ' 'यउ' 'इउ'
  • ९९ - तथा कहीं-कहीं 'इयउ' और 'उउ' लगा कर सामान्य भूतकाल के रूप बनाये जाते हैं—रासो में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हैं— \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन अन्य पुरुष—चालियउ, रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोयउ, \phantom{अन्य पुरुष—}हरव्यउ, बोलियउ, भागिणीयउ, दीठउ, \phantom{अन्य पुरुष—}मेल्लउ, पहिल्लउ—इत्यादि \phantom{कियउ, खोयउ,}+ मध्यम पुर ष—कहउ, सुणउ, इत्यादि । \phantom{कियउ, खोयउ,}+ प्रथम पुरुष—छोड़उ, तिजउ, डुबउ, साझोयउ, चूकउ, परिहरयउ, \phantom{प्रथम पुरुष—}इत्यादि । \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय}+ रासो में भूतकाल की क्रियाओं के उपर्युक्त रूपों के अतिरिक्त भी जो अन्य रूप प्राप्त हैं उनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है— \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन अन्य पु०-मिल्ली, दीन, पोन्दा, आया (खड़ी बोली) दिया (खड़ी \phantom{अन्य पु०-}बोली) हुई स्त्री० खड़ीबोली), दिन्ही (स्त्री), रहा (खड़ी \phantom{अन्य पु०-}बोली), गयो, आवीया, छाड्या, कीन, गई (स्त्री० खड़ी \phantom{अन्य पु०-}बोली), गया (पु० खड़ीबोली,)—इत्यादि । \phantom{खो}+ मध्यम पु०—देख्यो, सवाहा (खड़ी बोली) साइया, सिरजी, दिन्ही \phantom{मध्यम पु०—}थी, पहुता—इत्यादि । \phantom{आयियउ, रच्यउ, कि}+ प्रथम पु०—विसारा, करती (स्त्री० खड़ी बोली), बोलइ थी (स्त्री०खड़ी \phantom{प्रथम पु०—}बोली) छडी (स्त्री०) बोलिय्यो, थाकीय, कही (स्त्री० खड़ी \phantom{प्रथम पु०—}बोली), पिछाणीया आदि । भविष्यत् काल भविष्यत् काल के रूप डिंगल में दो तरह से बनाये जाते हैं १—मूल क्रिया के अन्त में 'सी', 'स्यू' तथा 'स्या' लगा कर और २—'ला', 'लो' तथा 'लौ' लगा कर। बीसलदेव रासो में द्वितीय प्रकार से बने भविष्यत् काल की क्रियाओं के रूप का अभाव है । \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन अन्य पु०—भाषिसी, मरेसी—इत्यादि । \phantom{रच्यउ, कि}+ मध्यम पु०— \phantom{चालिस} + \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कि}+ प्रथम पु०—चालिस्यो, आणिस्यां, मिलैस्यो, बोलिस्यां, पधारिस्यो, \phantom{प्रथम पु०—}करैस्यां, आविस्यां, पूछिस्यां, इत्यादि । \phantom{कि}+ 'सो' 'स्यू' तथा स्या' लगा कर बने हुए भविष्यत् काल की क्रियाओं के
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रूप के अतिरिक्त जो अन्य रूप 'बीसलदेव' रासो में प्राप्त हैं ये नीचे दिये जा रहे हैं- एक बचन बहु बचन अन्य पुरुष-जाणिस्यह, चखवाणगाउठ, मिलैसीय, धाविया, विसामइ, मिलैसह (स्त्री०)। + मध्यम पुरुष- + + प्रथम पुरुष--फरेण, भाणिसिउ (स्त्री०) सेविस्यउ (स्त्री०) मिलठ, पहुचिस्यौ इत्यादि। |- पूर्वकालिक क्रिया- डिंगल में क्रिया के अन्त में 'एवि' 'एविय' 'इ' 'ई', 'अ' 'य' 'नइ' 'करि' आदि प्रत्यय लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप बनाये जाते हैं। रासो में उपर्युक्त प्रत्ययों में से कई एक को लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप तो बनाये गये ही हैं लेकिन इन प्रत्ययों के योग से बने हुए पूर्वकालिक क्रियाओं के रूपों के अतिरिक्त भी कतिपय अन्य रूप इसमें प्राप्य हैं। नीचे दोनों प्रकार के रूपों का उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है- ( अ ) डिंगल के प्रत्ययों के योग से बनी हुई क्रियाएँ- सुणइ, कहइ, जाइकरि इत्यादि। ( ब ) डिंगल के प्रत्ययों के अतिरिक्त पूर्वकालिक क्रियाएँ- सहणजाइ, कहिज्योनाइ, देयणडजाइ, मेलडीजाइ-इत्यादि। आज्ञा विधि- रासो में आज्ञा और विधि के रूप निम्न प्रकार के पाये जाते हैं- एक वचन बहु वचन अन्य पुरुष-कीजइ, सुखउ, देइ, गमरकरउ, फाड, इत्यादि। + मध्यम पुरुष-आणिज्यो, देज्यो, जोइज्यो, करिज्यो, वितावावज्यो, मानिज्यो, सुणिज्यो, निरवाडिज्यो, चालिज्यो, सुण, सुखउ, कहि, धावउ-इत्यादि। + प्रथम पुरुष- + +

गवरूा¹ नंदन त्रिभुवन सार । नाद भेदइ² थारइ उदर भंडार ॥ एक दंतउ मुषि³ झलहलइ⁴ । मुषिकउ⁵ वाहण तिलरु सेंदूरि⁶ ॥ करि जोड़ि⁷ नरपति⁸ भणइ । आषि करि⁹ रोहणी निसि¹⁰ तपउ¹¹ सूरि¹² ॥ १ ॥ भवण नइ देपउरे रवि तपई¹³ । १. आ० २ गौरी । आ० ६, ६ गवरिवा । आ० १२ गउरि । २. आ० २ आ० ६, वैदा । ३. आ० २ आ० ६, मुख । आ० १२ मुपे । ४. आ० ६ झलमलइ (झलमलि = झलमलइ) । ५. आ० २ मूषा आ० ६ मूषाक । ६ आ० २ सेंदुर, आ० १२ सिंदूर । ७. आ० २ जोड़ै । ८. आ० ६ नाहलो (= नाल्हो) । ९. आ० २ जाणिक, आ० ६ जाणकि । १०. आ० २ रोहिणीउड, आ० ६ रोहिणीउड, आ० ६ रोहिणीयु, आ० १२ रोहिणीजिउ । ११. आ० ६ तपे आ० १२ तपइ । १२. आ० १२ सूर । १३. आ० १२ तलइ । यह छंद आ० ६ में १, प्र० २ में २, आ० ६ में १, आ० १२ में १ है । इस छंद की अंतिम पंक्ति हस्त लिखित प्रति की छंद नं० २ की प्रथम पंक्ति है । लेकिन यह भूल से लिखी हुई ज्ञात होती है । क्योंकि यह पंक्ति ध्रुवक के रूप में है जो प्रत्येक छंद के अंत में आता है ।

  • २ - हंस गमणि¹ मृगालोचनी² नारि । सीम मगग्ह दिन गिणइ³ ॥ सतपिण⁴ उलीछइ राजदुवारि । चिहु दिसि नाह निहालती ॥ का⁵ सिरजी⁶ उलगणा⁷ की नारि । जाइ दिहाडउ झूरता⁸ ॥ २ ॥ दूसरौ⁹ कडवड¹⁰ गणपति गाइ । नवणि नवकरि¹¹ लागे जी पाइ¹² ॥ तोदि लंबोदर रीनगउ¹³ । सिद्धि बुधि का स्वामी मुगति दातार¹⁴ ॥ १. अ० २ हंस गाहणि, आ० १२ गज गमणी । २ अ० २ मिगलोचनि, आ० ६ मृगलोचणी । ३. आ० ६ गणै । ४. आ० ६ सायघण, आ० १२ ततपिण । ५. अ० २, आ० ६ जिण, आ० १२ काइ । ६ अ० २ सिरजइ, आ० ६ सिरजा । ७. आ० ६ उलिगणधर । ८. आ० ६ भूरती, आ० १२ रे झूरता । यह छंद अ० २ में १, आ० ६ में २, आ० ६ में २, आ० १२ में ३ है । अ० २ में एक और अतिरिक्त पाठ है—"इसी नारी न देव दुग्गिणीकाइ" आ० १२ में चौथी पंक्ति है—"नाहनइ जोवइरे चिहुँदिसइ ।" ९ आ० १२ दुसरइ । १० आ० ६ कडवेजी, आ० १२ कडुवइजी । ११. आ० ६ नमीकरी, आ० १२ नवण कहूँ । १२. अ० २ बीनम्, आ० ६ बीनउ, आ० १२ बीनवु । १३ अ० २ भूलेउ, आ० १२ भूलोजी । १४. आ० १२ अवलागुजी पाइ ।
  • ३ - चउथि फउं थारउ पारखउ । तंजी भूलडजी¹ अक्षर आणिस्यो ठाइ ॥ ३ ॥ हंस बाहण देवी करधरउ² वीण । जूठउ³ किरत कहई⁴ कुल हीण⁵ ॥ वर देइओ⁶ मातासारदा⁷ । भूलउ⁸ अक्षर आणिस्यो ठाइ ॥ तह⁹ तूठी¹⁰ अक्षर¹¹ जरइ¹² । नाह्र भवइ अति सरसीय वाणि¹³ ॥ ४ ॥ १. आ० १२ सिद्धि नई तुद्धि तणउ भंडार । यह छंद आ० ६ में ३, अ० २ मे ४, आ० ६ में ३, आ० १२ में २ है । लेकिन अ० २ में १, २, ४ तथा ५ पंक्तियां निम्न प्रकार से हैं :- १. तुठी सारदा त्रिभुवन-माई । २. देव विनायक लागू हू पाय । ४. चउसठि जोगिनि का अगिवाण । ५. चडय जोहारू रोपरौ । २. आ० ६ ग्रहइ, आ० १२ करिधरी । ३. अ० २ कुकठबंधू बोलू, आ० १२ झूठउ जो कवित । ४. आ० ६ कहूँ । ५. आ० ६ मतिहीण । ६. आ० ६ दीयो । ७. आ० ६ देवी सारदा, आ० १२ सारदा । ८. आ० १२ भूलोजी । ९. अ० २ तो । १०. अ० २ तूठा, आ० १२ तूठइ । ११. अ० २ वर । १२. अ० प्रापियइ, आ० १२ जुटइ । १३. आ० १२ वाण । यह छंद आ०६ में ४, अ०२ में ५, आ०६ में ४, आ०१२ में ४ है ।
  • ४ - भारह रमायण रम भरी गाइ । नृती छइ¹ मारदा त्रिभुवन माय ॥ उलगाणा गुण² वनवड³ । मुगुण⁴ सामाणमा⁵ संपेविना⁶ रानि ॥ स्त्रीयचरित्र⁷ घण⁸ पणू⁹ लहह । एक्की अक्खर¹⁰ वञ्न¹¹ विसाम ॥ ५ ॥ किंतु आ० २ में २, ३, ५ और ६ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं २. सुकट फथू षोलू कुलदेण । ३. तो तूंठा वर प्रापिणइ । ५. वीसलदे रास प्रगासता । ६. नाल्ह कहइ जिणि आनइ हा गाडि । इसी प्रकार आ० ६ में निम्न दो पंक्तियां अतिरिक्त हैं:— सरसता सामणि करी वै पसाय । रास कहूँ राजा वीसलराय ॥ १. आ० १२ नूतह जूठी छै । २. आ० ६ रग । ३. आ० ६ वराखण्ड, आ० २ वरखता, आ० १२ वरखण्ड । ४ आ० २ फुकड, आ० १२ मुगुण । ५. आ० ६ सुमाणस, आ० १२ सुमाणसा । ६ आ० २ जिण कहई, आ० ६ तुम्हे संपस्यो, आ० १२ सो । -प्यो रास । ७. आ० २ अस्त्री चरित, आ० १२ सतीय चरित । ८. आ० २ गति । ६. आ० २ फो, आ० १२ लपलहै । १०. आ० २ आखर । ११ आ० २ रस सरइ । यह छंद आ० ६ में ५, आ० २ में ३, आ० ६ में ४, आ० १२ म ५ है । किंतु आ० २ में और आ० ६ में ४ थी पंक्ति इस प्रकार है:—
  • ५ - राजमतीय कुमरीय मनद चितवइ १ । हंसिवि बेटी २ बात पदि जाइ ॥ सुणउ नरेसर बीनती । रूपक इम मोहनी जाण ३ ॥ सुरगिहि ४ मोहयद ५ देवता । जोइज्यो वर थति सगुण ६ सुजाण ॥ ६ ॥ पडिया ७ तोन बोलाअहद्दई ८ राय ९ । लेषतडउ १० पाह्मा ११ राजलइ १२ आय १३ ॥

प्र० २-कुकल कुमारिसा जिण कढ्ढई रास । आ० ६-कुकल कुमारणस सीप न लाय । आ० १२ में प्रथम पंक्ति है-नाल्ह सायण राखभ गाय तथा अंतिम पंक्ति है-एकणि कुनचन सरब विणास । १. आ० ६ मनहि चिताय । २ आ० ६ हस इस वेटी । ३. आ० ६ मांनी जाण । ४. आ० १२ सरगहि । ५ आ० १२ मोध्याह्रै । ६ आ० १२ सुगण । यह छंद आ० ६ मे ६ है, आ० १२ में ६ है। लेकिन आ० १२ में इसकी प्रथम चार पंक्तियाँ हैं - १. राजमती यौवन भरो । २. बापनइ पासितइ मेहइ कुवरी । ३. सुणहु नरेसर बीनती । ४. रूपइक दर्प मेन्ही जाण । ७. प्र० २ पाह्या । ८. प्र० २ हा, आ० १२ ता नर बोलारइ है । ६. आ० १२ राय । १०. आ० ६ पतउउ लेइ करि । ११. प्र० २ जसा, आ० १२ धे । १२ प्र० २ मेणउ, आ० १२ पेला बी । १३. प्र० २ आई ।

  • ६ - मुगर¹ साँ² था म्हारा³ पाँढ्या⁴ । आणि कोई नर⁵ चतुर सुजाण ॥ सुरगद⁶ मोहइ⁷ देवता । पर बीसल विचिछण राजा बीसलदेउ चहुयाण ॥ ७ ॥ गढ अजमेरि⁸ वसह्रि⁹ भूवालि१० । चहुयाण कुल¹¹ तिलक सिंगार¹² ॥

१. आ० २ मुदिन, आ० १२ सोउर । २. आ० २ कहे, आ० ६ कहहि, आ० १२ सोये । ३. आ० २ रूढ़ा, आ० ६ म । ४. आ० ६ शेणसी । ५. आ० १२ नागर । ६. आ० २ आ० ६ सुरनर, आ० १२ सुरगदि । ७. आ० १२ मोहइ छे । यह छन्द आ० ६ में ८, आ० २ में १५, आ० ६ में १२, आ० १२ में ८ है । किन्तु आ० २ में पंक्ति नं० ४ और ६ इस प्रकार हैं :— ४. चतुर नागण ईसउ आणव्यो चंद । ६. जिम गोवल माहि सोहइ गोव्यंद । और आ० ६ में पंक्ति नं० ४ और ६ हैं :— ४. चतुर नर आणजो बींद । ६. उवाका चरण दीसि जिसा पुनिम चंद । आ० १२ में अंतिम पंक्ति है—धीरविचक्षण बीसल चहुवाण । ८. आ० ६ अजमेरा, आ० १२ अजमेरे । ९. आ० ६ वसैजी, आ० १२ वसइरे । १०. आ० ६ भूपाल, आ० १२ भोवाल । ११. आ० ६ वंस, आ० १२ चहंवाण कुल । १२. आ० ६ नेत्सहि ।

  • ७ - कुलीय¹ पुत्री से² ऊलगइ । महमत्तह³ स्त्रीय सहस अठार ॥ लाख तोरा घरे⁴ पापरहूँ⁵ । ईसठ वर वीसलदे⁶ बहुथाण ॥ ८ ॥ वाभण⁷ भाट⁸ बोलाइद्लह⁹ राय । छगन सोपारीय¹⁰ दोन¹¹ पठाइ¹² ॥ गइ अजगेर¹³ थेगग¹⁴ करड । उच्चइ का पाटि¹⁵ महिसारि¹⁶ नइ पपाञ्जिओ पाइ ।

१. आ० ६ चोरास्या । २. आ० ६ जिहा, आ० १२ सेई । ३. आ० ६ मयदह । ४. आ० ६ पाषर । ५. आ० ६ पडै । ६ आ० ६ बीसलते, आ० १२ सुवर बीसल । यह छन्द आ० ६ म ६, आ० ६ म १७, आ० १२ म ६ है। किन्तु आ० ६ म पंक्तियों ४ और ६ इस प्रकार हैं :- ४. वाण्या हस्ती घुरै नीसाण । ६ वाडीश साभी वर वासल राय । आ० १२ म ४ थी तथा ५ वीं पंक्तियाँ हैं :- ४. मयमत्त हस्तीय गुजइहै नारि । ५. लाख तुरी पाषर पडै ॥ ७. अ० २ पाटया, आ० ६ पाढीया । ८. अ० २ आ० ६, तोहि । ९. अ० २ वालावइ, आ० १२ छै । १०. आ० १२ सुपारीय । ११. आ० ६ दीप, अ० २ लेकरि आ० ६ लेई । १२. अ० २ जाहि, आ० ६ राजलैजाय । १३. अ० २ अजमेरा, आ० १२ अजगेरि । १४ आ० ६ जायग्था, आ० १२ गमन । १५. अ० २ चउरी, आ० ६ चाचर । १६. अ० २ वहंसी, आ० ६ पैठ ।

  • ८ - बेटी पहिण्यो राजा भोज की । राजमती घर धीमन्त राउ¹ ॥ ९ ॥ दीन² सोपारह³ दरणीयउ⁴ राउ⁵ । मनह आणंद्रीयउ अतिहि उछाह ॥ वाजे वाजञ्छइ भीसाणे घाउ । घरिमहि⁶ गुडी रे उलुजी⁷ ॥ दोयद बाजइछइ दुदवडी । कामणि गावइछइ⁸ मंगल च्यारि⁹ ॥ धुधुआण कुलि¹⁰ उधरउ¹¹ । जट्टघरि¹² आयी¹³ जाति पवारि¹⁴ ॥१०॥ १. आ० १२ यय । यह छन्द आ० ६ में १०, अ० २ में १६, आ० ६ में १६, आ० १२ में १० है। आ० १२ में ४थी पंक्ति है :—पाटि वैसारि पायलिग्यो पाइ । २. अ० २ आ० ६ दई, आ० १२ दीन्ही । ३. आ० १२ सोपारी । ४. आ० ६, आ० ६, मनहरपीयउ, अ० २ मनिहरप्याहह, आ० १२ मनहरपीयो । ५. आ० १२ यय । ६. अ० २, आ० ६, गढ़माहिं । ७. अ० २, आ० ६, ऊलुली । ८. अ० २, आ० ६, तोरणि, आ० १२ गावै । ९. आ० १२ प्यार । १०. आ० ६, दस, आ० १२ कुल । ११. आ० १२ उधरयो । १२. अ० २ आ० ६, बौंधरि, आ० १२ जउ । १३. आ० ६ आवइछै, आ० ६ आवी, आ० १२ आविस्यै । १४. आ० १२ पुवारि । यह छन्द आ० ६ में १२, अ० २ मे २१, आ० ६ में २१,
  • ६ - लाख वड बंभण¹ समदीयउलह² राह । दीन्दा तेजी³ कुलह क्याई⁴ ॥ दीन्हो⁵ सोनउ सोलदउ⁶ । पाट पटघर⁷ पात्राओ⁸ पान ॥ कर ज्योरी⁹ राणा भणइ¹⁰ । थागिला¹¹ राउ¹² सिउ¹³ रिध्यो¹⁴ मान¹५ ॥११॥ आ० १२ म ११ है । लेकिन अ० २ तथा आ० ६ म ३री तथा ५वीं पत्तियां नहीं हैं । आ० १२ म ३री पत्ति है—नाजारे बाज्या नीसाणे रे घाव । ४थी ,, मनहि आणंदिउ अधिक उछाह । ५वीं ,, दुटवड नानै लै दुटवही । १ आ० १२ बामण । २ अ० २ समददलूह, आ० ६ नै दीयै, आ० १२ समुदायो । ३ आ० ६ तेजोय, अ० २ घोडउ, आ० ६ घोडै । ४ आ० ६ कमाय । ५ अ० २ दीन्हे, आ० १२ दीइउछै । ६ आ० १२ सोनोजी । ७. अ० २ पगेला, आ० ६ बइसारी नै । ८ अ० २ आ० ६, बीड़ा । ९. आ० १२ ज्योडी । १०. आ० ६ कहइ । ११. अ० २ पाढया, आ० ६ पाढीया । १२ अ० २ घाउड, आ० ६ तुन्द, आ० १२ राय । १३ अ० २ म्हाका, आ० ६ माहरा, आ० १२ सू । १४. आ० १२ शषिध्यो । १५. आ० १२ मन । यह छन्द आ० ६ म १३, अ० २ म २२, आ० ६ म २२, आ० १२ में १२ है ।
  • १० - थामण महित भीतरि गयौ राउ । मनह¹ आणंदिय² अधिव उछाह ॥ गढ अजमेर वधामणी³ । पाट महादेवि राणी नीमीयडधीन⁴ ॥ संगलड अंतवेर कोपीय⁵ ॥ थोडी थोडी⁶ म्हाकौ⁷ राषिन्यो माम⁸ ॥१२॥ राज्ञा⁹ मंत्रीय१० लीयड¹¹ रे धोलाय । थान कदी राजा वारि¹² बइसइ¹³ ॥ आगहो¹⁴ राजा मोडड¹⁵ धीरिकड¹⁶ । थे सनहु¹⁷ इडयर¹⁸ तुरीय केवाण ॥ १. आ० १२ मनहि । २. आ० १२ आणंदिड । ३ आ० १२ बघामणा । ४. आ० १२ धन । ५. आ० ६ कोपियड, आ० १२ सयल अंतवर कोपीयो । ६. आ० ६ थोडो थोडो, आ० १३ थोडड । ७. आ० ६ माकउ, आ० १२ म्हाकउ । ८. आ० १२ मान । यह छन्द आ० ६ म १४, आ० १२ म १३ है । ६. आ० १२ राज । १०. आ० १२ मनी । ११. आ० १२ लीयो । १२. आ० १२ चाचरि । १३. आ० १२ बैसाय । १४. आ० ६ आगे, आ० १२ आगे । १५. आ० ६ राजा मोहड, आ० १२ राजा मोहड । १६. आ० १२ धारकौ । १७. आ० १२ समझवी । १८. आ० १२ इयवर ।
  • ३१ - संजहु¹ गूद² पाजपी । संजऊ³ वाजा४ अवर५ निसारण ॥ संजऊ⁶ पाइक⁷ पापरया । ये विलंबिण⁸ करिज्यो कहइ⁹ चहुआण१० ॥१३॥ तठह¹¹ ब्याहरू घालियऊ¹२ बीसलराउ¹३ । चिहु दिसे¹४ थाणा भोज पाठ्ठइ¹५ ॥ तुरीष भला चढ़ि आविग्यो¹६ । जे थाणा थाते¹७ बोलावीया राय१८ ॥ कुलीय छत्तीसइ जे चड़इ१९ । वाजा हो वाजणा अवर मड़ाइ२० ॥ १. आ० १२ सजहुवै । २. आ० १२ घोडा । ३. आ० १२ सजहु । ४. आ० १२ वायना । ५. आ० १२ अवर । ६. आ० १२ सजहुवै । ७. आ० १२ पायक । ८. आ० १२ विलंबम । ९. आ० १२ कहै । १०. आ० १२ चहुवाण । यह छंद आ० १२ में १४, आ० ६ में १५ है। ११. आ० १२ तठै । १२. आ० १२ चालीयौ । १३. आ० १२ वीसलराइ । १४. आ० १२ दिसि । १५. आ० १२ पठाय । १६. आ० ६ तुरीषा भला चड़ि आविन्योराय, आ० १२ तुरीय भले रे आवियै । १७. आ० १२ क्यु धाण थाते । १८. आ० १२ राइ । १६. आ० १२ चढै । २०. आ० १२ मढा ।
  • १७ - भाल मग्ग पादव जुइ¹। भाउ पाभण तठ्ठै² करइ³ पराण ॥ मयमंत⁴ इसी सिंगारिजइ⁵। दृणि परि⁶ चालीयउ⁷ राइ चउआण⁸ ॥१४॥ मेलि मिही तषद घडीयउ पुट्ठ राय⁹। गूरित्र मंडळ¹⁰ रहिउ छुकाइ ॥ कउतिग आया¹¹ देवता । स्वर्गहं¹² आवीया¹³ सुरहं¹⁴ पेमाण ॥ दण उआरइ¹⁵ थपहुरा । तउधन¹⁶ हो वीसल¹⁷ चऊघाण ॥१५॥ १. आ० १२ जुढे । २. आ० १२ तठे । ३. आ० १० करे । ४. आ० १२ मह मंत । ५. आ० १२ सिंगारि जे । ६. आ० १२ इणपरि । ७. आ० १२ हालीयउ । ८. आ० १२ रावचौहाण । यह छंद आ० ६ म १६, आ० १२ मे १५ है । ९. आ० १२ तठे चढिउ छे राइ । १०. आ० ६ लेह स्यु, आ० १२ पैदै । ११. अ० २ आव्या, आ० १२ कउतिक आयउं । १२. आ० ६ सरगह, अ० २ आ० ६ कोतिग । १३. अ० २ आव्या, आ० ६ मे आया । १४. आ० ६ अमर, अ० २ इन्द्र, आ० ६ इन्द्र, आ० १२ अमर । १५. आ० ६ उतारच्छह, आ० १२ उतारे । १६. आ० ६ तुधनधन, आ० १२ धनधनतुं । १७. आ० ६ वीसलदे, आ० १२ चीसलदे चहुआण । यह छंद आ० ६ मे १७, अ० २, आ० ६ मे २७, आ० १२