बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 103
- ३७ - २. परसर्ग के साथ- कर्त्ता- + कर्म - माधवह, राणीमह, जोगीमह, राजमतीनह, गोरीनह । करण-जाणिवरि, माथासा, पुरुषसिउ, स्वामी सिऊ, घरतीरथं । सम्प्रदान- + अपादान-गउदते, फलाने । सम्बन्ध-गवरका, उसगाणा की, भोजकह, सयाणायण्ड, 'बुद्धइव', जेसद्ध- जेसळमेररी', अजमेरा कयह । अधिकरण-मनमाहे, राजमाहि, परटेमह पर, पगे मो । सम्बोधन- हे हिरणीय, हे अभया, हे घण-इत्यादि । सर्वनाम पुरुष वाचक प्रथम पुरुष द्वितीय पुरुष तृतीय पुरुष कर्त्ता म्है, म्हा तुम्हे, तू, ये, तउ उस, उव, सो कर्म म्हारू, हमि, म्दानह, तोहि, तोन, तूनह, उनवि, उणनह, म्हारह, म्हारूह, तूहेह, तउ, तुमही तिहा, तिणह मोनह, मोह सोइ करण म्हा, स, हमस्यं तुम्हस, तं विणि सं, तिणासां सम्प्रदान + + + अपादान + + + सम्बन्ध म्हारी, म्हाकह, मउ, थारइ, धारउ, थारी, तिणि, उयारह मो, म्हारइ, माका, थारा, तिस, तोरो, म्हारउ, म्हारीय, म्हा, थाकउ, तुझ, तोरीं म्हारी, मुधि, म्हाका, म्हारा, मोरा अधिकरण + + -इत्यादि । अन्य सर्वनाम 'कोई' (अनिश्चय वाचक) 'जे' (सम्बन्ध वाचक) 'यह' (निश्चय वाचक) 'किसउ' (सर्वनामिक विशेषण) 'जउ' (सम्बन्ध वाचक) 'सो' (सम्बन्ध वाचक)