भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 315 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102
  • ३५: - माणियो भानियो वयणु वयन मागिण मागिन मयण गयन गिण गिन, इत्यादि। [३] अपभ्रंश की भाँति संज्ञाओं के अन्त में 'ड़ा', 'ड़ी' और 'ड' का प्रयोग मिलता है। गूजड़ा सेसड़ी मुदड़ी गोहड़ी राएड़ी चूनड़ी दुप्पटी भापड़ी हठवट पतरंड इत्यादि। दोयट कारक बीसलदेव रासो की १६३३ वाली प्रति में विभक्तियों की दशा बड़ी विचित्र है। डिंगल में प्रयुक्त होने वाली विभक्तियाँ जो प्रायः व्यवहार में लायी गयी हैं उसका प्रधान कारण 'रासो' का १७ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा जाना ज्ञात होता है। डिंगल में कारक दो प्रकार से व्यक्त किये जाते हैं। एक प्रकार वह है जिसमें शब्दों के साथ विभक्तियों का प्रयोग होता है और दूसरा प्रकार यह है जिसमें शब्दों के साथ पार्सर्ग ( Post position ) का व्यवहार किया जाता है। रासो में इन दोनों प्रकारों का प्रयोग हुआ है। दोनों प्रकारों के प्रयोगों का उदाहरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है :- १. विभक्ति के साथ- प्रथमा-राइ, गोरि, गोरदि, पंडइ, जोयिनऊ। द्वितीया-मुंपिउठ, पतउठ, पीवउठ, सीसउठ, औपयठ, कंपउ। तृतीया-हस्ते, राइ, मुखि, हुपि, दिठि। चतुर्थी-अजमेरि। पञ्चमी- ÷ षष्ठी-सुरगह, सुरह, वनह, जोवनह। सप्तमी-अजमेरि, उळगइ, तनहि, सिरि, घरि, दुवारि, देसि, मनि। अष्टमी (सम्बोधन)-पंडिया, बालमदेव, गोरी, रणी- इत्यादि।