बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ४८ - 'जिरा' (सम्बन्ध वाचक) 'काहू' (प्रश्नवाचक 'कह' (प्रश्नवाचक) 'सउ' (सार्वनामिक विशेषण), 'किह' (प्रश्नवाचक) 'कियकड' (अनिश्चयवाचक), 'कठ' (प्रश्नवाचक) 'ताहू' (अनिश्चयवाचक), 'समी' सार्वनामिक विशेषण) 'वसौ' (निश्चयवाचक) 'ए' (निश्चयवाचक) 'कवण' (प्रश्नवाचक), 'ते' (सम्बन्धवाचक बहुवचन) 'एह' (निश्चयवाचक) 'कुण' (प्रश्नवाचक)-इत्यादि । अव्यय जिमि-जैसे । किम-कैसे । जाणि-मानों । कइ—या, अथवा जैसा-जैसा । किसी-कैसी । तबइ-तब । इव-इस प्रकार तब—तब । सदि-साथ । किसो परि किस प्रकार । क-कैसे । सम—समान अरु—और : क्रिया वर्तमान काल कारक की भाँति क्रियाओं का रूप भी बीसलदेव रासो में प्राय डिंगल का वही है । हिन्दी में वर्तमानकालिक क्रिया के साथ जिस अर्थ में 'है' का प्रयोग होता है डिंगल में उसी अर्थ में प्रायः 'छह' प्रयुक्त होता है । रासो में है के अर्थ में 'छह' का प्रयोग प्रायः बर्त्तमान काल की क्रिया के अन्य पुरुष में पाया जाता है । अन्य पुरुष—बोलावइ छह, वाजइ छह, दीजइ छह, बहठी छह, वरसइ छह, मेलइ, मोडर छह—इत्यादि । वर्तमान काल की क्रिया में है के अर्थ में 'छह' के तथा उकारान्त प्रयोग के अतिरिक्त अपभ्रंश के क्रिया पद 'इकारान्त' का भी प्रयोग अनेक स्थलों पर इस काव्य में किया गया है । एक वचन बहु वचन अन्य पुरुष—छहजइ, भजइ, गिणइ, कहइ, गाइ, चितवइ, + जाइ उच्चरइ, पुच्छइ, नाणइ, बोलावइ, हसाइइ, वरिसइ, इत्यादि । मध्यम पुरुष—धरउ, जाउ, जाणउ, सबहउ—इत्यादि + प्रथम पुरुष—वीनवउ, मणवउ, गरजूं, पडउ, छागू, अयउ, बहउ— इत्यादि । + भूतकाल भूतकालिक क्रियाओं में डिंगल में मूल क्रिया के पीछे 'इउ' 'यउ' 'इउ'