भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 315 में से

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  • ४ - भारह रमायण रम भरी गाइ । नृती छइ¹ मारदा त्रिभुवन माय ॥ उलगाणा गुण² वनवड³ । मुगुण⁴ सामाणमा⁵ संपेविना⁶ रानि ॥ स्त्रीयचरित्र⁷ घण⁸ पणू⁹ लहह । एक्की अक्खर¹⁰ वञ्न¹¹ विसाम ॥ ५ ॥ किंतु आ० २ में २, ३, ५ और ६ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं २. सुकट फथू षोलू कुलदेण । ३. तो तूंठा वर प्रापिणइ । ५. वीसलदे रास प्रगासता । ६. नाल्ह कहइ जिणि आनइ हा गाडि । इसी प्रकार आ० ६ में निम्न दो पंक्तियां अतिरिक्त हैं:— सरसता सामणि करी वै पसाय । रास कहूँ राजा वीसलराय ॥ १. आ० १२ नूतह जूठी छै । २. आ० ६ रग । ३. आ० ६ वराखण्ड, आ० २ वरखता, आ० १२ वरखण्ड । ४ आ० २ फुकड, आ० १२ मुगुण । ५. आ० ६ सुमाणस, आ० १२ सुमाणसा । ६ आ० २ जिण कहई, आ० ६ तुम्हे संपस्यो, आ० १२ सो । -प्यो रास । ७. आ० २ अस्त्री चरित, आ० १२ सतीय चरित । ८. आ० २ गति । ६. आ० २ फो, आ० १२ लपलहै । १०. आ० २ आखर । ११ आ० २ रस सरइ । यह छंद आ० ६ में ५, आ० २ में ३, आ० ६ में ४, आ० १२ म ५ है । किंतु आ० २ में और आ० ६ में ४ थी पंक्ति इस प्रकार है:—
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