बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें-- ४ --
नागरी । सुरक्षित स्थान—बीकानेर में बड़े उपासरे के बृहद्—ज्ञानभण्डार के एक गुटके में । पुष्पिका—इति श्री वीसल दे रास संपूर्णः ॥ संवत १६८१ वर्षे भाद्र सुदि ६ परणी सुत बाभरे । लिषतं चवरा ॥ सुभंभवतु ॥ आदि—श्री गुरुभ्यो नम ॥ राग केदारउ ॥ गडरि मा मदन त्रिभुवन सार । माइ मेरुइ धारइ उदर भण्डार । एक दंतउ भुज झलहलइ ! मूसका वाहण तिळक सिन्दूर । कर ज्योडि नरपति भणइ । जाणि कर रोहियो जियड सप्पड सूर । अन्त—कनरू काया जैसी कुंकु की रोल । कठिन पयोधर हेम कचोल । केलगर भुजि सी आंगुली । धारउं उद्वगाया पचइ नह कहिवाण । राणी राजा स्यु मिला । तिम पुखि संसारि मिलि ज्यो सउकोइ । रचना तिथि—नहीं है । [ ४ ] यहप्रति बालोतरा (जोधपुर राज्य) के भावर्दीय शास्त्रगच्छ भण्डार में है । इसकी पत्र सख्या ४२ और छंद सख्या २४८ है । इसका लेखन काल सं० १६८५ है । इसमें रचना काल "सयल सहस तिउतरइ" दिया है । [ ५ ] यह प्रति जैसलमेर में वृद्धिचन्द जी के संग्रह में सुरक्षित है । १४ पत्रों की इस प्रति में २४२ पद्य हैं । रचना काल का उल्लेख नहीं है। केवल भा० सु० ५ रो, का उल्लेख है । प्रति सं० १७२३ की लिखित है । [ ६ ] नाम वीसलदेव रास । कागज—देशी (हाथ का बना हुआ) । पत्र—३० पृष्ठ दोनों तरफ लिखे हुए । आकार--१० इ० x ४ १/२ इ० । पंक्तियाँ--१६ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्य संख्या--२६६, चार खण्डों में क्रमानुसार ३३, ३९, १०२ और ९१ छन्द हैं । प्रकार— पुराना, अच्छी हालत में, पूर्ण ।