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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 315 में से

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– ५ – लिपि—देवनागरी अक्षर । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार, बीकानेर । पुष्पिका—संवत् १७२४ वर्षे मगयशीर वदि १५ । [ गुप्त सं० आरम्भ—सुंमम श्रीजिनाय ॥ गवरी का नंदन त्रिभोवन समूह न० १६, सार । नाववेदां थारो उद्रि भण्डार । कर जोडी नाहलो संवेत प्र० ] कवि । मूनांश वाढण तिलक सींदूर । एक दंता मुषक महि । ज्योंण कि रोहणी हठ तपे सूर । सुवण मोदो पर कामिणी । हंस गमणि मृगालोचणी नारि । सीस समारि दिन गणै । साघण उमीद्धि शम्भु हुयार । नाह न देखि चिहूंदिसा । शिख सरण्यो उजगाणा की नारि । तो ज्याय दीढाडो सूरतां ॥ अन्त—गजपगमणी तृगालोचणो नारि । सेकि संभारि दिन गणै । साधण उमीद्धे थीह हुयारि । नाह न देखू' चिहू दिशा । किण कोड हो उभगंणिया की नारि । सा जाय दीढाढा सुरता ॥ रचना तिथि—सवत् बार बाहोतरा मझारि । ज्येष्ठबदी नवमी बुधवार । नाहल रसायण आरम्भ्यो । सारदा तुठी छै ब्रह्मकुमार । कास मीशं मूपक मंडणी । रास परगांत ए बीसलराय । [ ७ ] नाम—बीसलदेव रासो ! काग़ज—देशी [ गुप्त प० ( हाथ का बना हुआ ) । पत्र—३० पत्र दोनों ओर लिखे समूह न० ६, हुए । आकार—१० इ० × ४½ इ० । पंक्तियों--११ संकेत “बी०”] पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद सख्या--२४८ पद । प्रकार- पुराना, अंतिम पत्र तथा अन्य पत्रो के किनारे सुसज्जित । पूर्ण । अक्षर—देवनागरी लिपि । सुरक्षित स्थान— अभयजैन भण्डार, बीकानेर । पुष्पिका—संवत् १७३७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० दिने । लिखितं पडित कीर्ति विज्ञास गणिना । साध्यो राजलछमी तत्‌शिष्यश्री सुमतिलष्मी तत्‌शिष्यश्रो प्रेम लदमी पठनाय॑म् ॥

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य) · पृष्ठ 13, कुल 315 में से · BharatKosha