बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ३६ - आरम्भ—गरविद्या नंदनत्रिभुवन सार । नाव भेदइ सारद वदर भण्डार । एक दंतउ मुषिक अहल्लइ । मुषका बाण विसाल सिन्दूर । कर ज्योती नरपति अथइ । ज्यालि- करि रोहिणीदूह्यौ सप्पउ भूर ॥ १ ॥ वहं भत्रव न देषूं रि रवितजह्र । हंस गमणी मृगालोचनी नारि । सीस समारह्र दिन गयइ । सतविण तुमीदूह साठु दुवारि । नाह नह ज्योवइ रे बिंहूँ दिसइ । फांट सिरडयी उछगर्गाणा री नारि । ज्याइ दिहाइ उरे सुरती । एक पग आंगणी एक पग द्वार । अन्त—कनक काया तिमि कूं कूं रोल । कठिन पयोधर हेम कचोल । केलि-गरमसी कूं घडी । घाइलत्यू पष मोडइ नाङ । कंठि मोडह चाषइ गोरडी । उणकी विरह वेदना नां खडइ कोइ । जिउं राजा राणी मिल्या । हयूं नावइ कहइ मिलिज्यो सहु कोइ ॥ रचना तिथि—संवत् सहस सत्तरहइ बयालि । नालहकबीसर सरसीय बाणि । गुण गूंथ्या चउहाणका । सुकुल पषपंचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामण्ड । सुदिन गिण जोइसी जोडियउ रास । [ ८ ] यह प्रति बीकानेर के अनूप संस्कृत लाइब्रेरी के एक गुटके में है। इसकी पद्यसंख्या २४१ है। रचना तिथि सहस सत्तहत्तरह आ० सु० ५ रो० का उल्लेख है। गुटका सं० १७५२ फा० सु० १३ को कविवर समयसुन्दर की परम्परा के ज्ञानतिलक की लिखित है। उसे गोरमष्टा पचाणण सुत जगजीवन के पठनार्थ लिखाया गया है। प्रारम्भ के दो पत्र प्राप्त नहीं हैं। [ ९ ] नाम—बीसलदे रास ! कागज—देशी [ गुप्त · पं० (हाथ का बना हुआ) पत्र—४५ पत्र दोनों तरफ लिखे रामहंस न० ९, हुए। आकार—६ इं० X ५ ३/४ इ० । पंक्तियाँ—१३ से संकेत "२०" ] १५ तक प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्य संख्या—२५८ । प्रकार— पुराना; अच्छी अवस्था, पूर्ण । अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार बीकानेर ।