बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ३२ - जउ¹ धारह² साभरि उमद्दह³ । रिन्दै⁴ उवा घरि⁵ उग्गह⁶ हीरा गी पाणि ॥४१॥
- धत्तह धमत्रीयउ बीसलराउ । धणका⁷ वचन⁸ रहा मन माहि ॥ मूँह⁹ विसाराहा१० गोरठी११ । हम तुम्ह१२ यार बरस का कयि१३ ॥ यहउ१४ तुम्हारउ१५ जे सुणउ१६ । मूँह सठ जाइ देया हीरा की पाण ॥ १ +२ आ० ६ यार घरि, आ० १० जह धारे । ३ आ० १० उग्र है । ४ +५. ग्र० २ राजा उक्त घरि, आ० ६ उण घरि, आ० १२ उदाधरि । ६ आ० १२ उग्रदै यह छंद आ० ६ में ४५, आ० ६ अध्याय २ में २, ग्र० २ अध्याय २ में ४ है । आ० १२ में ४३ है । ७ आ० १२ कणका । ८ ग्र० २ बोल ! ९ ग्र० २ हूँ । १० ग्र० २ वीसइयो, आ० १० विसणश । ११ ग्र० २ ते वढिठा, आ० १२ तुम्हें गोरडी । १२ आ० ६ अब तम, ग्र० २ म्हानु, आ० १२ हम तुम । १३ ग्र० २, आ० ६ लार, आ० १२ कहि कायी । १४ आ० १२ कह्यो । १५ आ० १२ तुम्हारो । १६ आ० १२ सुण्यो । यह छंद आ० ६ में ४६, आ ६ अध्याय २ में ३, ग्र० २ अध्याय २ में ५, आ० १२ में ४४ है । इस छंद की पाँचवीं और छठी पंक्ति ग्र० २ और आ० २ में इस प्रकार हैं— ५ कउ म्हारह हीरा उमद्दइ । ६ नही तो गोरी लिजूं हूँ पराणा । तथा आ० ६ में तीसरी पंक्ति है—