भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 139
  • ३३ -

म्हैं¹ विराण्या² बोलियउ³ दोस⁴ । पग की⁵ पाणहीस⁶ रिसउ⁷ रोस⁸ ॥ कीटी उपरि बठली किसी । म्हे हरया ये करि जाणीयठ साच ॥ कुमी⁹ मेल्हि¹⁰ उलंग¹¹ चलउ¹² । जल¹³ विहुणीय किम जीवइ मछ्¹⁴ ॥ ५३ ॥


मन माहि कुमपाखोपरौ । इस छंद की पहिली और दूसरी पंक्तियाँ ग्र० २ और आ० ६ में परस्पर स्थानान्तरित हैं । १+२ अ० २ हूँ खरा की, आ० १२ म्हे सिरासी । ३. अ० २ घणी, आ० ६ म्हाराधणी, आ० १० बोलियो । ४. अ० २ रोस ( इसके पहले इसमें 'बोकियउ' है ) । ५. अ० २ पावकी आ० ६ ( में नहीं है ) आ० १० पावनी । ६. आ० ६ पाणही सि, आ० ६ पाशही उपरि, ग्र० २ पाणहीसु आ० १२ पानही सू । ७+८ अ० २ कियउ रोस, आ० ६ एकसो रोस, आ० १० किसी रोस । ९+१० अ० २ कमही मेल्है अ० १२ कुमीय मेल्हि । ११. आ० ६ उलंगह, आ०६ नै, अ० २ (में नहीं है) आ०१२ मतउलग । १२. आ० ६ चलिउ, आ० १२ जाइ । १३. अ० २ में (इससे पहले राजा है ) । आ० १२ जलहि । १४. अ० २ हास । आ० १२ जीवइलामाछ् । यह छंद आ० ६ में ४७, आ० ६ अध्याय २ में ४, ग्र० २ खण्ड २ में ६ तथा आ० १२ में ४५ है । अ० २ में इस छंद की तीसरी और चौथी पंक्ति इस प्रकार है— ३. "मेय इसती बोलियो ।" ४ "आपणह मान इतौ मानस छह सास ।" आ० ६ में इसी प्रकार चौथी पंक्ति है — ४ "आणइ मनि तुम्हे मानियो साच ।" ३