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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 315 में से

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  • ३४ - जनम¹ हुयउ² थारउ जेसलमेरि । परणि आणी तउ गढ़ अजमेर ॥ धरम थारह³ क दावड़ी⁴ । कहारे⁵ उड़ीसउ अरू जगनाथ ॥ अन छोडउ⁶ पाणी निजड । तउ कहि⁷ नहूँ⁸ गोरी थारी⁹ जनम की वात ॥ ४४ ॥ जनम की वात गुणउ¹⁰ धरहू नरेस । बनपड¹¹ भोगयउ¹² हरिण कहू येषि ॥ षोडउ समण दिन गिणउ आव । नरजला करती ग्यादमी ॥ १+२-अ० २, आ० ६, जनमी गोरी तू । आ० १२, जनम हुउ । ३ अ० २ चार । ४. अ० २, आ० ६ यारटी । ५ अ० २, कु समरणो, आ० ६, किम समरूँ । ६ अ० २, आ० ६, मेल्हू । ७+८ अ० २, कहित । ९. आ० ६, अ० २, थारा । यह छंद आ० ६ में ४८, आ० ६ अध्याय ७ म ५, अ० २ खंड २ में ७, आ० १२ म ४६ है । आ० १२ में २री पंक्ति है—परखिने आणी तोनै गढ़ अजमेर । ,, ४ थी पंक्ति है—कद्दारे उडीसवि देपु आपणी नयाण । ,, ५ वीं पंक्ति है—उलगाणा हुइ गमरकरूँ । ,, ६ ठा पंक्ति है—कोकि भतीजा नै सौपियु राज । ,, ७ वीं पंक्ति है—छोडु दस सराखपौ । ,, ८ वीं पंक्ति है—कोकु अमण दिन गिणु आन । १०. आ० ६ पूछरछइ । ११ + १२ अ० बनपड रहती ।
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य) · पृष्ठ 140, कुल 315 में से · BharatKosha