भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • ४८ - सांबरि¹ नीर रुधीर भरि । पच्छदवामणि खण्ड नेह विश्राम² ॥ ६५ ॥ चासउ उल्लग जाण न देइ³ । ✓ बह्र मुक्त मारि कहू सरीसीय⁴ लेइ⁵ ॥ अचल प्रह साधण⁶ कटइ⁷ । हुइ दुप सालह हो सामीय साह ॥ जोधन मुरडीय मारिस्या⁸ । दोन रिसउ⁹ जइ¹⁰ साधण¹¹ वांस¹² ॥ ६६ ॥ १ आ० ६ साभर । २. आ० १२ विश्राम । यह छन्द आ० ६ में ६८ तथा आ० १२ में ६० है। इस छन्द की तीसरी पंक्ति आ० ६ में है—"नाल्ह रसायण इम भणै" तथा चौथी पंक्ति है—"मनहि उडि काटि तो फास" आ० १२ में चौथी पंक्ति है—"मनहि उफाटियो ना रहुमास" तथा पाँचवी पंक्ति है—"साभरि नीर न वीमरा" ३. अ० २ आ० ६ देहि । ४. अ० २ साथ सु, आ० ६ मुक्त सरमी । ५. अ० २ लेहि । ६. आ० ६ अ० २ तै धन । ७ अ० २, आ० ६ रही. आ० १२ कई । ८. आ० ६ मारिज्यु, आ० १२ माग्म्यै । ९. आ० ६ फमा को । १०+११ आ० गोरदी को, आ० १२ राजा । १२. आ० ६ नाह । यह छंद अ० २ खड २ में ३२, आ० ६ खड २ में २६, आ० ६ में ७० है । इस छंद की ४, ५, ६ठी पंक्तिया अ० २ में इस प्रकार हैं— ४ इक हवेली आरन पूर । ५. सुनी सेज थीदेस पिउ । ६. हुहुइ दुप नाल्ह कह दूगो कूण । आ० १२ में पहिली पंक्ति है—चालस्या उलंगवण जाण न देइ । आ० १२ में चौथी पंक्ति है—रोइ दुप सालै सामुही वाग्झ ।