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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 315 में से

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पृष्ठ 155
  • ४६ - छोड़ि नह$^१$ गोरी$^२$ गउ दे$^३$ मुक जाण । बरस$^४$ दिन रहंउ धारी$^५$ दै$^६$ थाण ॥ कठन पयउद्दर$^७$ दिय$^८$ कीया$^९$ । सच हुसि करि गोरटी$^{१०}$ कहइ$^{११}$ विचार$^{१२}$ ॥ ए$^{१३}$ दिय$^{१४}$ कीया$^{१५}$ थाणरा । स्वामीय$^{१६}$ जा$^{१७}$ दिया$^{१८}$ हुआ$^{१९}$ सुर नर सार ॥ ६७ ॥ कातिग स्वामी तू चारण देहि । तुदन न चालिनइ बरिसइ हो$^{२०}$ मेहु ॥ छाछच करि कामणि कहइ$^{२१}$ । १. अ० २, आ० ६ अचल, आ० १२ छाडि नै । २. अ० २, आ० ६ पणि, आ० १२ गोरीटी । ३. आ० ६ देहि, आ० १२ (में नहीं है) । ४. अ० १ दोय । ५+६ - अ० देवकी, अ० १२ थारटी । ७. आ० १२ पयाणह । ८+६ - आ० ६ देव कीपा, आ० १२ दिवकरु । १०. अ० २ गोरी, आ० १२ गोरीय । ११ अ० २ पूछइहइ, आ० ६ पूछइ, आ० १२ करै । १२. अ० २ आ० ६ नाह । १३+१४ - आ० ६ एक दिव, आ० १२ ए दिन । १५ आ० ६ सयण, अ० २ छुइ परिउ, आ० १२ यका । १६+१७+१८ - अ० २ इण दियणी, आ० ६ इह दिवसा । १६ अ० २ हुया । यह छंद अ० २ खड २ में ३३, आ० ६ खड २ में ३०, आ० ६ में ७१ है। लेकिन आ० ६ में दूसरी पंक्ति छूट गई है। आ० १२ में अंतिम पंक्ति है-"ए दिन न्य हुयै सुर नर सार ।" २०. आ० १२ वरिस्यै । २१. आ० १२ कहै । ४
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