बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 163
- ५७ - १सठइ सुखि हे भावज१ बोलइछइ२ राड३ । ४करि जोडा अरु५ कहइ६ सुभाड ॥ चीसल दै करह७ बीनती । थे परहरै कोप मो देह८ आसीस ॥ दुप दारुण म्हारइ९ को१० नही । कलश आणि११ की परीय जगोस ॥ ७८ ॥ १२उभी हो१२ भावज देह छइ१३ सीप । १४रतन कचोलइ किम१४ पट१५ भीप ॥ ───────────────────────────────────────────── इस छंद की ५ वीं पक्ति अ० २ मे इस प्रकार है— ‘हसि गलि लाई भोजि करख।’ एव आ० ६ मे है :—“हसि गलि लाई भांभी काखि।” आ० १२ मे इस छंद की पहली पंक्ति है— “तठै आई छै भावज मानिय काखि।” तथा आ० १२ में इसकी दूसरी पक्ति है—“आंचलि थाकै सारीय आणि।” १ आ० ६ (में नहीं है) आ० १२ में “तठइ” नहीं है। २ आ० ६ बोलीयउ आ० १२ बोलैछै। ३. आ० १२ राइ। ४. आ० १२ कर जोडी अरु, आ० ६ नइ। ५+६. आ० ६ लागू पाइ, आ० १२, कहु समाइ। ७. आ० १२ करे। ८. आ० ६ मोदि यो। ९ आ० १२ म्हानै। १० आ० १२ कौ। ११ आ० १२ आण ॥ यह छंद आ० ६ में ८२, आ० १२ में ७५ है। आ० १२ में इस छंद की ४ थी पक्ति है— तुम्ह परिहरी कोप मुझ देहु आसीस। १२. अ० २ ऊमीय, आ० ६ ऊभी छै, आ० १२ ऊभीय। १३. आ० १२ दीप छै। १४+१५ अ० २ राय साप जे, आ० ६ सपणे, आ० १२ रतन कचेोले बी पठे।