बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ६४ -
पहाउ¹ इमारठ² जे गुण्ठ³ । स्वामी सेव⁴ दुद्देशी⁵ यद्य परदेसि ॥ कुहक⁶ मोर सुशमणा । राउ तउ फेरि कुबुधीय घणाकड येम ॥ ८६ ॥ टसण णाता किम रहा नारि । वोलिया वाए नई चितह विचारि ॥ थोएवउ पाए गहे तउ आरण्ड । वहसि⁷ उगादिरपा हीरा कज पाज⁸ ॥ बुद्धि विहपाणह जिन रहइ⁹ । रहे तउ पहुगा थाविया देथे हे नार ॥ ८७ ॥
१. आ० १२ कह्यो । २ आ० १२ हमारो । ३. आ० १२ मुणै । ४+५. आ० ६ सेवा दुहेली । ६. आ० १२ कुहकै । यह छंद अ० २ खण्ड २ में १३, आ० ६ खण्ड २ में १०, आ० ६ में ६१, आ० १२ में ८३ है— अ० २ तथा आ० ६ में इस छंद की पहिली और दूसरी तथा चौथी और छठी पंक्तियां इस प्रकार हैं— १ कुंवरी कहई सुणी सामरया राव । २ काईं स्वामी तु उलग्ह जाइ । ४. बारह छह साठ अतेवरी नारि । ६ राज कुंवरी निति भोगवि राय । आ० १२ इस छंद की अंतिम पंक्ति है— देषि कुबुधीय घण केरो बीस । ७. आ० १२ वैसि । ८ आ० १२ की पाखी । ९ आ० १२ रहे । नोट—यह छंद अ० २ में ६१ है। आ० ६ में यह पुनः ६२ है