बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें५ - ६५ - उधग जाय कौ परीय जगीस । राजा ब्राह्मण कौ^१ देह घई^२ सीधि ॥ दूणि विधि^३ राज मादे संचरे^४ । चट्ठा राजा सभा परधान^५ ॥ तिथि सु^६ मीठा बालिज्यो^७ । नाई साहूणी^८ दण्ड^९ मान ॥ पांदीय^१० सरिसठ मति^११ इसउ^१२ । तटह राह घोडा इसी भीतर गोठि ॥ तथा अ० १२ में ८४ है । लेकिन इस छंद तथा इस प्रति की छंद सख्या ६१ में निम्न अन्तर है — पंक्ति ४. उतह पाणि उगादिया होरा की थाइ । " ५. मुझ दिण छिण तू जिन रहइ । " ६. वेगि मिलिस्या तुम्ह नइ आइ । आ० १२ में इस छंद की दूसरी पंक्ति नहीं है । आ० १२ में इस छंद की तीसरी पंक्ति के स्थान पर है— "बोल्यो पलिस्था आपणी ।" तथा अंतिम पंक्ति के स्थान पर है— "वेगा अबिह्या तुरीय पलाथि ।" १ आ० ६ नीति गति, अ० २ कुवरधन । २ अ० २ पेमउँ, आ० ६ धण दीयै । ३ आ० ६ ईणि परि । ४. अ० २ राज मादे पहिरहूँ, आ० ६ राजमाहे बेसझ्यो, आ० ६ राज माहि गम करे । ५ अ० २, आ० ६ राज चलायक अ० परधान । ६+७. अ० २, आ० ६ इसासु विरोष नहुँ बोलिजइ । ८. अ० २, आ० ६ नावी साहुणी, आ० ६ नाई साहुणी । ९ अ० २ मुधराई, आ० ६ सुदधी, आ० ६ दोनु । १०. अ० २ दासी । ११+१२ अ० २ मिय इसोउ, आ० ६ मति इसै ।