बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ६६ - राम जनम घरि षोखियो । काक गङ्गा घरु नीची दिट्टि ॥ टहण आग्य णे घरीयं दुसार¹ । राजनी² रीति³ जाणि⁴ पँटाणी⁵ धार ॥ मुरुप लोग न जाणही⁶ । चोर जुवारी कह्⁷ छाछ⁸ ॥ 7 तिण स्य⁹ हसी म¹⁰ वाखिण्यो । राजा जी पूच्छै¹¹ भरम की बात ॥ झूठी साची थे मत कहइजउ¹² । मुहम्र झाझट थे देज्यो हाथ ॥
यह छंद ग्र० २ खण्ड २ में ५६, आ० ६ खण्ड २ में ५७, आ० ६ में ६३ है । किंतु आ० ६ में ८, ६, १० इस प्रकार हैं :— ८ सुणि रावल तु हज किया जाय । ६ राज मांहि नातोभिगण करो । १० राजा तेड़ी चोपड़ी देयि । १ अ० २ तोसार । २+३ आ० ६ राजा की नीति, आ० १२ राजनीतिरीति । ४ अ० २, आ० ६ जिसी, आ० ६ जाणो, आ० १२ छै । ५ आ० ६ पेदाकी, आ० १२ पांटानी । ६ आ० ६ न जायइ सार । ७ आ० ६ अझर, आ० १२ अउर । ८ आ० १२ कलाल । ६ अ० २ ईशाण, आ० ६ णाण, आ० ६ तिआस्यू, आ० १२ मु । १० आ० १२ इसीय न । ११ आ० १२ पूछेछै । १२ आ० १२ कहो । यह छंद ग्र० २ खण्ड २ में ६०, आ० ६ खण्ड २ में ५८, आ० ६ में ६४ तथा आ० १२ में ८५ है । इस छंद की अंतिम दो