भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 198
  • ६१ - जुझ बूंझवाणा मुकि१ गया२ छोट ॥ जाम द्विवस सारण३ सय४ । पल दृट घालि न लायए पाठ ॥ अनल५ जळइ६ घण७ पर जरा । दंग मरोवर दुंदि गयउ८ ठाउ९ ॥ श्रासाइह तुरि बाहुटवा१० मेरू११ । पज्जिहणा पाख१२ नह१३ यदि गई पेह ॥ जह रि१४ आसाइ न आयही१५ । माता दै मईगलमिठ पग देई ॥ १+२. अ० २ अप मूकद्द छुद्द, आ० ६ नह सुका । ३+४. अ० २ रापी सू अहद्द, आ० ६ सारणि यहद्द । ५. अ० २ अन, आ० ६ अगनि । ६. अ० २, आ० ६ चळई । ७. अ० २ दव, आ० ६ बन । ८+६ अ० २ घाहर छुद्द ठाम, आ० ६ छोड़या ठाम आ० १२ तुकी गयो ठाउ । यह छंद अ० २ खड ३ में १६, आ० ६ खड ३ में १४, आ० ९ में ११६, आ० १२ में ११७ है। लेकिनि अ० २ और आ० ६ में चौथी पक्ति है:— “बरती पावन देख्यो जाय ।” तथा अ० २ में तीसरी पक्ति है— “हनेहा सारण यहई ।” १०+११ अ० २ आ० ६ बहूकिया । १२+१३. अ० पाल्या, आ० १२ पालने । १४. आ० २ आ० ६ अभी । १५. अ० २ आ० ६ न बाहुइयउ, आ० ६ नावीया, आ० १२ आवीयो ।