भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 201
  • ६५ - धयउया¹ चउरा² चउपैंढी । तबधण धवत्था पउत्ति पगार ॥ हरिप³ चढ़ी इरपी फिरइ । झब⁴ घरे⁵ आविसी⁶ मुधि⁷ भरतार ॥ बारहमास वडझायिया नारि । दैव मेखड दीयठ कइ घणि मारि ॥ सूखि पाकि पंजर हुई । जिम भमर पुरंदर केतकी वास ॥ तिम मोरइ⁸ प्रीय⁹ गम कीयह१० । सेज बीसारी गोरी आसासि ॥ १. आ० ६ माडी, अ० २ माहूया । २. आ० ६ चोरा । ३. आ० ६ हरप । ४. आ० १२ इव । ५. आ० १२ घरि । ६. आ० १२ आवसी । ७. आ० १२ मुध । यह छंद अ० २ खड ३ में २०, आ० ६ रा० ३ में १८, आ० ६ में १३३, आ० १२ में १२१ है । लेकिन अ० २ में ४, ५, ६, है —४. म्हाइया सामरिका रखिवास । ५. एक चलायै बाइट्या । ६ नाइ उतरि गयो गंगा के पार । और आ० ६ में ४ और ६ है:— ४ दखणिर माल्हा जिम पलटाय । ६. क्म्हारा घणौ राय । तथा आ० १२ में २री और ३री पंक्तियां नहीं हैं । ५ वीं पंक्ति है:— “गोपि चढ़ी हरपै फिरै ।” ८. आ० १२ मारै । ९. आ० १२ प्रिउ । १०. आ० १२ कीयो ।