बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ६४ - भादरवद्द¹ परतद्द सुहिर गभीर । जलथल महियल² नहि मध्या मीर ॥ शाथि कि सायर उछट्यउ । जिम³ अंधारी⁴ वीज⁵ वियाइ⁶ ॥ बादलं⁷ धरती स्यं⁸ मिळ्या⁹ । दुह हुय¹⁰ नहडक¹¹ सहणाणाह ॥ चामोलहू घण मंदिया वास । धवलया¹² मदिर¹³ घर¹⁴ कियजास ॥ १. आ० १२ भाद्रवे । २. अ० २ मगेहर, आ० १२ मदियल । ३+४. अ० २ एक अधारी, आ० ६ रैण अंधारी । ५+६. अ० २ वाच सीमाइ, आ० ६ वरसइ मेह । ७ आ० ६ सपरजे । ८ आ० ६ धरती है । ६ आ० ६ नीतरया, आ० १२ अपिवास । १०. आ० ६ ए हुय । ११. आ० ६ कि, आ० १२ कु । यह छंद अ० २ खंड ३ में १६, आ० ६ खड ३ में १७, आ० ६ मं १३२, आ० १२ में १२० है । किन्तु अ० २ में ५ वीं पंक्ति है— “सूनी सेज बिदेश पिय ।” और आ० ६ में निम्न दो पंक्तियाँ उपर्युक्त खड की ५वीं पंक्ति के बाद हैं- १. “भूल राठ न देपइ भी आइ । २. हूँती गोसामी नइ एकली ॥” आ० १२ में इस छंद की ५वीं पंक्ति नहीं है । १२ आ० ६ घर । १३. आ० ६ लीप्या । १४ आ० ६ माझण ।