बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें~ १०४ ~ बंदिया आइ कहिं पय वर मादह१। तहू मोहू दीन्दी२ भी लीलनी वाद ॥ पद सूरिज दुई मादीया३ । पवन पानी पर४ धावी धाहावि५ ॥ धूप अतसउ पड धसन्ना६ । १४ तट गूवा दीखानी लहर देखावि७ ॥१४५॥ साईं१० राज तडपा यह अडया - नीर । दह गुट्टी पहुँता समुंद दह पोरि ॥ यह कदी कामची मालदल११ । एक रिसउ१२ स्वामी परह समात्रि ॥ पय थकि१३ पनुख१४ दुई रही। बुल्लियानो त्रिम गफा१५ दाल ॥१४६॥ १ अ० २ पाणी वहह योग आ० ६ पांडीउ पदै । २. अ० २ मन की नाद । ३ अ० २ ताया दाई थी, आ० ६ वि मादि दाधा । ४ अ० २ चंद सूरिज दुह दीया सात । ५ अ० २ पाणी पवन धरि, आ० ६ पाणी पवन नै । ६ अ० २ धूप अफासि, आ० ६ धूप अफारा । ७ अ० २ दोर पुजाइ थी बांमखे, आ० ६ द्रव्य पुनाय्यो बामखे । ८+६ अ० २ मूसौ दे नग दल दुहथी विसास, आ० ६ मूसी दी नग दल एणी वेशास । यह छंद अ० २ खंड ३ में ३१, आ० ६ खंड ३ में २६ है । तथा अ० २ में पंक्ति तीन और चार परस्पर स्थानान्तरित हैं एव पाँचवी और छठी के बीच अतिरिक्त निम्न पंक्ति है — "हूँ नवि जाणु महम करै।" १०. आ० १२ स्वामी । ११ आ० १२ भोलय्या । १२ आ० १२ रसा । १३. आ० १२ पलि । १४ आ० १२ पजरि । १५. आ० १२ चंपिकी ।