भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १०५ - घाले¹ हो पलीय तुम्हारउ² जंघ । कठिन पयोधर तिजयउ³ पराण ॥ घाख्यठ⁴ जोवन सिसि गपउ⁵ । जोवन सिर घाधीया नेत⁶ ॥ जिण बांध्या रावण पिस्यंड । श्रीय कारणि रामि⁷ बंध्यठ सिर सेत⁸ ॥१४७॥ यह छंद अ० २, आ० ६, आ० ६ में नहीं है । आ० १२ में १३२ है। १. आ० १२ बालुं । २. आ० तुम्हारी । ३. आ० १२ तझ्या । ४. आ० १२ बालड । ५. आ० १२ गयो । ६. आ० १२ नेन । ७. अ० २ अक्षी गेली राम, आ० ६ अक्षी जगि राम, आ० १२ तिया कारणि रामि । ८. आ० १२ वध्यो सरास । यह छंद अ० २ खंड ३ में ५१, आ० ६ खंड ३ में ४८ है, आ० ६ (में नहीं है) । आ० १२ में १३३ है। लेकिन अ० २ और आ० ६ में इसकी प्रथम ५ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं :-- १. वेगि (दयाकरि-आ० ६) मया करि तू घर चालि । २. कठिन पयोधर छाड छह (छोडीया-आ० ६) ठामि (वाम- आ० ६) । ३. सिपर ते (झइ आ० ६) घरती रहइ (है-आ० ६) नीम्भा (नभ्या-आ० ६) । ४. अंभला असूर असती (तेउसमा-आ० ६) (अचेत-आ० ६) । ५. एक सरो चारि आवजू (आविज्मो-आ० ६) । आ० १२ में ५वीं पंक्ति नहीं है । लेकिन एक पंक्ति और है:-- "नाकसउ पहिलो पंथासथी ।"