भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १०७ - राय अंतडर छोर्धिगठ । जल बिहूणा .किम माछु¹ पटाह्रै² ॥ घणी विहूणी घण वाकिज्जइ । वहगा आविय्यो जोवन³ जाय⁴ ॥१४९॥ पंख्या तिम⁵ कहैय्यो जिम⁶ प्रीय मिरीसाइ । साथ्य मुझ विण स्रस न थाइ ॥ कुणादी⁷ फाटउ कंचूवड । सीस⁸ फाड्डु अहइ दक्षण तीर ॥ दव धाधी जिम⁹ छावटी । वहगा आविय्यो नयन्द का धीर ॥१५०॥ कहिन गोरी थारा प्रीय¹⁰ अहिनाथ¹¹ । थोड २ मोनई¹² कहि नह सहिनाथ ॥ १ + २. आ० १२ जीवै माछ । ३ + ४. आ० १२ करइ पलाणि । यह छंद अ० २, आ० ६, आ० ६ मे नहीं है । आ० १२ में १३५ है । लेकिन आ० १२ में ३री पंक्ति नहीं है । ५. अ० २, आ० ६ तिणी परि बोलय्यो । ६. अ० २, आ० ६ बोलय्यो । ७. अ० २ कूहणी । ८. आ० ६ पांयर । ९. अ० २, आ० ६ आगे । यह छंद अ० २ खड ३ में २६, आ० ६ खंड ३ में २७ है । लेकिन इस छंद की १, ३ और ४ पंक्तियाँ ही अ० २ और आ० ६ में हैं । १०. अ० २ प्रीत का, आ० ६ प्रीत, आ० १२ प्रिड । ११. अ० २ मुहिनाथ । १२. आ० १२ मोहि ।