बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें- १०८ -
किण^१ ढण्हारा^२ सारिपठ^३ । ग्हारा ख्युटा देवर कह अणुहार ॥ इन्द गोरो पीयब राजउठ । उचट जोयां^४ कहि जमदाड़ ॥ डरि जाउठ कहि पातखाउ । द्वादस तिलक करह^५ नवहू^६ विहाइ ॥ खापा^७ मांहि^८ पिलाखि नह^९ । पंडिया म्हारा^१० प्रोतण^११ पृंढा^१२ सदिंगाण^१३ ॥५५॥
१. आ० ६ कुण, आ० १२ किसि । २. आ० ६ अणुहार, आ० १२ उविहारा । ३. अ० २ कीण सारिखो, आ० ६ कुण सारिखो । ४. अ० २ ऊँचउ गोरुउ, आ० ६ ऊँचो गोरो । ५+६ अ० २ उगउइ, आ० ६ करिडठाइ, आ० १२ करै नवइ । ७+८+६. आ० ६ खाप म्हील्याणादि लप लहइ । १०+११. अ० २ म्हा को प्रीयछह, आ० ६ मीड म्हारो, आ० १२ म्हारा त्रिउका । १२+१३. अ० २ इणतो सहिणाय, आ० ६ एण सहिणाण, आ० १२ ए सहिनाण । यह छंद अ० २ खड ३ में ३५, आ० ६ खड ३ में ३२, आ० १२ मे १५६ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में ६री पंक्ति का पाठ है:— ' जाणी अदिनायद लेह पोद्वाणि ।' तथा इन दोनों प्रतियो के बीच में दो पंक्तिया और हैं:— "पाय ऋषीणी मो अथी ( आ० ६—मोजकी ) । मूल्ल ( भोटो-आ० ६ ) करिपाण है टावइ हाथि ॥ आ० १२ में ६ठी पंक्ति नहीं है । तथा ६वीं पंक्ति के बदले में है— "राजा चढीपो हव नव लपै ।”