बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ११८ - उषि भुव¹ पाप न संपरइ² । उठहृ³ फिरइ जगनाथ थी आग ॥ १६५॥ पंडियउ जाइ नइ धाइउडइ पउलि⁴ । द्वादशि तिलक नई चंदन पउलि⁵ ॥ गलह⁶ जनेऊ⁷ , पाटकठ⁸ । हाथि थीमोराठ⁹ पुहुप की माछ ॥ राइ भुवण गढ¹⁰ जोइसी¹¹ । उभउ रापीयउ पउलि दुवारि¹² ॥ १६६॥ ! १. आ० २ तिय भई, आ० ६ जिएभुइ, आ० ६ उषि भुइ, आ० १२. उषि भइ । २. आ० २, आ० ६ लीपह्री, आ० १२ संचरै । ३. आ० २ तिहा । यह छंद आ० १२ में १५० है । आ० १२ में अंतिम पंक्ति है :- "उठि फिरै जगनाथ घर आए" । ४. आ० १२ रे पीलि । ५. आ० १० पौलि । ६ + ७. आ० २ कंठ जनोई, आ० कांधि जनोइय, आ० १२ गलै जनोई । ८. आ० १२ पाटकी । ६. आ० १२ बिजोरी । १०. आ० १२ गयो । ११. आ० १२ जोईजी । १२. आ० १२ उभो राकीयो पौलि दुवार । यह छंद संख्या १६५ तथा १६६, आ० २ खड ३ में ४६, आ० ६ खड ३ में ४३, आ० ६ में १६७-१६८ दोनो मिलाकर हैं । आ० १२ में १५१ है । लेकिन आ० २ और आ० ६ मे उपर्युक्त दोनों छंदों की प्रथम पंक्तियों के पहले ये पंक्तियाँ और हैं :-