बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- ११६ - पडियउ१ पारि२ बहठउ दइ३ जाइ । रायड पडिहार४ अय पोरुष्यउ राइ ॥ परदेसी कोई पडीयउ । म्हे स्वामी मेटिया आवीया रात५ दुपारी ॥१६७॥ एक सुणउ मुझ वीनती । एक अपूरब सुषद विचार ॥ रे पडिहार६ मँदावउ७ पार । बेगि उल्लो बुलावड८ सभा मझारि ॥ जाँणउ कवण९ देसांतरी । राव पडकीय पडियउ छीयरै बोलाई ॥ आपड देव दया करौ । जोसीय१० तुत्त११ बोलावइ राई ॥१६८॥ १ पडिमा ओवै पउलि पगार । २ चंदन तिलक अगि पीलि कराय । और आ० २ में एक पनि योर है "पठइ पापी रामती छे ।" १. आ० २ पढायों । २ आ० १२ बारणै । ३ आ० १२ बैठो । ४ आ० १२ बाइ पड़दार । ५ आ० ६ म्हे स्वामी मेटिया आवीयो राज, आ० १२ मेटेवा यायी राज । यह छंद आ० ६ में १६६, आ० १२ में १५२ है । आ० १२ में दूसरी और तीसरी पक्तियों के बीच में दो निम्न पक्तियाँ और हैं - १ एक सुणौ मुझ बीनती । २ एक अपूरख सुधौ विचार । ६ आ० १२ पढडर । ७ आ० १२ मणावौ । ८ आ० ६ योगी बालावडओ, ६ आ० १० कवणँ । आ० १३ बेगि बुलायी । १० आ० ६ जोइसी हा, आ० १२ ११ आ० १२ तैनैँ । जोइसा ।