बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें— १२० — रावल गेन्त्रि$^१$ पडौप कीयउ, हिं$^२$ प्रवेसि$^३$। हुंइ बिजोरउ मिलउ$^४$ नरेस॥ नगण कीधी राजा पूरियइ$^५$। गंग जमुन ज नीर बहाइ$^६$॥ चंद सूरिज जा लगि तपइ। ता लगि$^७$ राज थी कीरति हुयइ$^८$ ॥१६९॥ किहाँ घसठ थंभण किहाँ सोरी ठाउ$^९$। जोसी कहइ धारा नगर कउ नाठ॥ देव देसवरी दूरि कउ$^{१०}$। राणी राजमती दीयउ$^{११}$ पंडाइ॥ बरस बारह$^{१२}$ उल्य रह्यउ$^{१३}$। तुम्हि घरि आवियउ$^{१४}$ वीसलराउ ॥१७०॥ यह छंद आ० ६ में १७०, आ० १२ मे १५३ है। आ० १२ मे प्रथम दो पंक्तियों इस छंद की नहीं हैं। ये दोनों पंक्तियाँ आ० १० की छंद सख्या १५२ में जुडी हुई हैं। १. आ० २, आ० ६ जाइ। २ आ० ६ कीयो। ३. आ० ६ राय परवेश। ४ अ० २ दुज मिलइ, आ० ६ ५ आ० १२ पुरव्यो। मिलीया, आ० १२ मिल्यो। ६. अ० २ जन लगि बहै नीर ७ आ० ६ अविचल। ८ अ० ६ रहाइ, अ० २ राजा सयल परिवार, आ०६ राजछै तुमा सरीर। यह छंद अ० २ खड ३ में ४३, आ० ६ खड ३ में ४०, आ० ६ म १७१, आ० १२ म १५४ है। आ० १२ में पहिली पंक्ति है—रागले पडिये कीयो प्रवेश। आ० १२ में पाँचवीं पंक्ति नहीं है। तथा अन्तिम पंक्ति है— “ता लगि कीरति तुम्हर होइ।” ९ आ० १२ ठाम। १०. आ० १२ को। ११. आ० १२ हू दीयो। १२ आ० १२ बारै। १३. आ० १२ रह्यो। १४ आ० १२ आव्यौ। यह छंद आ० ६ में १७२ आ० १२ में १५५ है।