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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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  • १५ - रचना तिथि—संवत् सहस विहूतरे जांणि । नाइह फणीसर सरसीय घांणी । गुण गूथ्या चौहाण का । सुकल पक्ष पञ्चमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामखौ । सुदिन रीखी जोडीयो रास । द्रः—यह प्रति बारह सं० की प्रति की नकल जान पडती है । उपर्युक्त प्रतियों में से १६ प्रतियों के आधार पर डा० माता प्रसाद जी गुप्त ने इसका एक सुन्दर सम्पादित संस्करण हिन्दी परिषद् विश्वविद्यालय, प्रयाग से सन् १६५३ में प्रकाशित करवाया है । इस संस्करण में उन्होंने प्रतियों को उनके पाठसाम्य के आधार पर पाँच समूहों में रखा है । प्रत्येक समूह का नामकरण उन्होंने उस समूह में रखे गये प्रथम ग्रन्थ के संकेताक्षर से किया है । इन पाँचों समूहों की प्रतियाँ डा० गुप्त के मतानुसार कम से कम पाँच पाठ प्रस्तुत करती हैं जिनमें मिलाकर..... लगभग पौने पाँच सौ छन्द आते हैं । इन छन्दों में से केवल २७, २८ प्रतिशत छन्द उनके मतानुसार प्रामाणिक माने जा सकते हैं । प्रत्येक समूह के छन्दों की संख्या की तुलना अन्य समूह के छन्दों की संख्या से करते हुए डा० गुप्त ने कुल १२८ छन्दों को ही प्रामाणिक माना है । इनमें से भी ११८ छन्द तो तीन समूहों में पाये जाते हैं तथा दस ऐसे हैं जो तीन समूहों में से केवल दो ही में पाये जाते हैं ।¹ इस सम्पादित प्रति के पहले की एक और सम्पादित प्रति है जिसका उल्लेख किया जा चुका है । उस प्रति में किसी भी हस्तलिखित प्रति का तुलनात्मक अध्ययन नहीं प्रस्तुत किया गया है । केवल जयपुर में प्राप्त सं० १६६३ में लिखी गई प्रति का संपादन कर दिया गया है ।— श्री अगरचन्द जी नाहटा ने प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों का उल्लेख करते हुए उसके दो रूपान्तरों का वर्णन किया है और बताया है कि दोनों रूपान्तरों में काफी भिन्नता पायी जाती है ।² प्रस्तुत संपादन कार्य डा० गुप्त के कार्य को मान्यता देते हुए भी अपने ढंग से किया गया है । डा० गुप्त ने आज तक की प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों में से सबसे पुरानी प्रति सं० १६३३ वाली को भी आधार नहीं माना है । उन्होंने उसमें आये हुए छन्दों में से सिर्फ उन्हीं को प्रामाणिक माना है जो उनके द्वारा विभाजित समूहों में से प्राय सभी समूह की प्रतियों में प्राप्य हैं । लेकिन इस (१) बीसलदेवरासो...सं० डा० माता प्रसाद गुप्त...पृ० ४८ (२) राजस्थानी... (त्रैमासिक पत्रिका) भाग ३, अंक—३ पृ० १८ ।