बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
- १५ - रचना तिथि—संवत् सहस विहूतरे जांणि । नाइह फणीसर सरसीय घांणी । गुण गूथ्या चौहाण का । सुकल पक्ष पञ्चमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामखौ । सुदिन रीखी जोडीयो रास । द्रः—यह प्रति बारह सं० की प्रति की नकल जान पडती है । उपर्युक्त प्रतियों में से १६ प्रतियों के आधार पर डा० माता प्रसाद जी गुप्त ने इसका एक सुन्दर सम्पादित संस्करण हिन्दी परिषद् विश्वविद्यालय, प्रयाग से सन् १६५३ में प्रकाशित करवाया है । इस संस्करण में उन्होंने प्रतियों को उनके पाठसाम्य के आधार पर पाँच समूहों में रखा है । प्रत्येक समूह का नामकरण उन्होंने उस समूह में रखे गये प्रथम ग्रन्थ के संकेताक्षर से किया है । इन पाँचों समूहों की प्रतियाँ डा० गुप्त के मतानुसार कम से कम पाँच पाठ प्रस्तुत करती हैं जिनमें मिलाकर..... लगभग पौने पाँच सौ छन्द आते हैं । इन छन्दों में से केवल २७, २८ प्रतिशत छन्द उनके मतानुसार प्रामाणिक माने जा सकते हैं । प्रत्येक समूह के छन्दों की संख्या की तुलना अन्य समूह के छन्दों की संख्या से करते हुए डा० गुप्त ने कुल १२८ छन्दों को ही प्रामाणिक माना है । इनमें से भी ११८ छन्द तो तीन समूहों में पाये जाते हैं तथा दस ऐसे हैं जो तीन समूहों में से केवल दो ही में पाये जाते हैं ।¹ इस सम्पादित प्रति के पहले की एक और सम्पादित प्रति है जिसका उल्लेख किया जा चुका है । उस प्रति में किसी भी हस्तलिखित प्रति का तुलनात्मक अध्ययन नहीं प्रस्तुत किया गया है । केवल जयपुर में प्राप्त सं० १६६३ में लिखी गई प्रति का संपादन कर दिया गया है ।— श्री अगरचन्द जी नाहटा ने प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों का उल्लेख करते हुए उसके दो रूपान्तरों का वर्णन किया है और बताया है कि दोनों रूपान्तरों में काफी भिन्नता पायी जाती है ।² प्रस्तुत संपादन कार्य डा० गुप्त के कार्य को मान्यता देते हुए भी अपने ढंग से किया गया है । डा० गुप्त ने आज तक की प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों में से सबसे पुरानी प्रति सं० १६३३ वाली को भी आधार नहीं माना है । उन्होंने उसमें आये हुए छन्दों में से सिर्फ उन्हीं को प्रामाणिक माना है जो उनके द्वारा विभाजित समूहों में से प्राय सभी समूह की प्रतियों में प्राप्य हैं । लेकिन इस (१) बीसलदेवरासो...सं० डा० माता प्रसाद गुप्त...पृ० ४८ (२) राजस्थानी... (त्रैमासिक पत्रिका) भाग ३, अंक—३ पृ० १८ ।
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मात्र को मान लेने पर सबसे टेढ़ा प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि सं० १६३३ वाली प्रति में आये हुए छन्दों में जिनकी संख्या २७६ है, केवल १२८ को ही कैसे प्रामाणिक मान लिया जाय । चूंकि यह प्रति आज तक की प्राप्य प्रतियों में सबसे प्राचीन है, इसलिये उचित तो यही होगा कि इसके सभी छन्दों को प्रामा- णिक माना जाय । इसके बाद वाली प्रतियों में जो छन्द इसके नहीं प्राप्य हैं, उनके सम्बन्ध में ऐसा समझना होगा कि परवर्ती लेखकों को वे छन्द या तो ज्ञात नहीं हुए अथवा ज्ञात होते हुए भी उन लेखकों ने उन छन्दों को छोड़ दिया हो और स्वरचित छन्दों को जोड़ दिया हो । इसी आधार को ध्यान में रखकर सं० १६३३ की लिखी हुई प्रति को प्रामाणिक माना गया है । उसमें आये हुए सभी छन्दों को प्रामाणिक मानते हुए प्राप्य २७ प्रतियों को उनकी पुरावता के आधार पर चार समूहों में विभाजित किया गया है । कार्य की सुविधा के लिये इन चार समूहों का संकेताक्षर क्रमशः 'अ', 'आ', 'क' एवं 'ख' रखा गया है । (१) 'अ' समूह— इस समूह में उन सभी प्रतियों को स्थान दिया गया है, जो १७ वीं शताब्दी की हैं । परिचय पत्र में इनकी संख्या १ से ५ तक है । (२) 'आ' समूह— इस समूह में वे सभी प्रतियाँ आती हैं, जो अट्ठारहवीं शताब्दी की हैं, तथा जिनकी संख्या परिचय पत्र में ६ से १३ तक है । (३) 'क' समूह— यह समूह १६ वीं शताब्दी की लिखित प्रतियों का है । इसमें परिचय पत्र के अनुसार केवल एक प्रति सं० १४ वाली आती है । (४) 'ख' समूह— इस समूह में परिचय पत्र की शेष संख्या १५ से २७ तक की वे सभी प्रतियां हैं, जिसका लेखन काल ज्ञात नहीं है । उपर्युक्त विभाजन के अनुसार (१) 'अ' समूह में डा० गुप्त की 'प०' समूह की नं० ३ संकेताक्षर 'प०' तथा 'सं०' समूह की नं० १४ संकेताक्षर 'सं०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (२) 'आ' समूह में डा० गुप्त की 'सं०' समूह की नं० १६ संकेत 'प्र०', प० समूह की नं०-६ संकेत 'की०' तथा नं० ६ संकेत 'र०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (३) 'क' समूह में डा० गुप्त के की कोई प्रति नहीं आती । (४) 'ख' समूह में डा० गुप्त के 'प०' समूह नं० ६
२ - १७ - संकेत 'प्र०' नं० ५ संकेत 'आ' नं० ८ संकेत 'आ०', नं० ५ संकेत 'घा०' तथा 'म०' समूह की न० २ संकेत 'मृ' प्रतियाँ आती हैं। इस तुलनात्मक अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि उपर्युक्त चार समूहों में से तीन समूहों में डा० गुप्त के दो समूहों 'प०' अथवा सं० समूह की कोई न कोई प्रति अवश्य है। विशेष रूप से 'घ' समूह में तो डा० गुप्त के 'पं०' तथा 'सं०' दोनों समूहों की प्रतियाँ हैं। डा० गुप्त के 'प०' समूहकी न०-३ प्रति स० १६३३ की लिखी हुई है जिसे यहाँ 'भ०' समूह में रखा गया है; क्योंकि कथित विभाजन के अनुसार यह प्रति १७ वीं शताब्दी की है और सबसे प्राचीन प्राप्य प्रति है। डा० गुप्त ने अन्य जिन प्रतियों को इस समूह (प० समूह) में रखा है उनमें से सं० १७२७ और १७५१ वाली प्रतियों को छोड़कर जिन्हें यहाँ 'आ' समूह में १८ वीं शताब्दी की होने के कारण रखा गया है, प्राय किसी भी प्रति में पुष्पिका नहीं है। ऐसी प्रतियों की संख्या इस समूह में पाँच है। जिन प्रतियों में पुष्पिका नहीं है, वे किस संवत् में लिखी गईं यह एक विवादा- त्मक प्रश्न है। अतएव उनको इस संपादन कार्य में विशेष स्थान नहीं दिया गया है। पुष्पिका के अभाव के कारण ही ये प्रतियाँ यहाँ 'ख' समूह में रखी गई हैं। डा० गुप्त के 'सं०' समूह की १६६१ वाली प्रति (नं० १५) भी कथित 'घ' समूह में आती है जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। 'सं०' समूह में डा० गुप्त ने इस प्रति के अतिरिक्त एक और प्रति को रखा है जिसकी संख्या १५ है तथा संकेताक्षर 'प्र०' है। इस प्रति को यहाँ 'आ०' समूह में रखा गया है क्यों- कि यह संवत् १७२४ की लिखी है। इन दोनों समूहों के अतिरिक्त डा० गुप्त के तीन अन्य समूहों की प्रतियों में से 'म०' समूह की एक प्रति न २ संकेताक्षर 'म०' यहाँ 'घ' समूह में रखी गई है क्योंकि इसमें भी पुष्पिका का अभाव है। इस 'ग०' समूह की एक प्रति और है जिसका पूर्ण विवरण प्राप्त न होने के कारण न तो उसका परिचय पत्र में ही उल्लेख किया है और न उसे किसी समूह स्थान ही दिया गया है। दूसरा समूह "म०" समूह है जिसकी केवल एक प्रति प्राप्य है और वह भी किसी अन्य प्राचीन प्रति की प्रतिलिपि है तथा पुष्पिका का अभाव है, साथ ही अनेक त्रुटियाँ भी हैं। अतएव इसका तथा तीसरे समूह 'अ०' में आने वाली दो प्रतियों का भी उल्लेख इन्हीं कारणों में से किसी एक के कारण परिचय पत्र में नहीं किया गया है। कथित समूहों तथा डा० गुप्त के समूहों के तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् (१) बीसलदेव रासो-सं०-माताप्रसाद गुप्त-पृ० ३-१२।
१. प्रथम खण्ड: राजा बीसलदेव एवं मालवा राजकन्या राजमती विवाह
– १८ – इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि 'बीसलदेव रासो' की प्रतियों के दो रूपान्तर हैं।$^१$ एक तो वह जो चार खण्डों में विभक्त है और दूसरा वह जिसमें खंडों का विभाजन नहीं है। इन रूपान्तरों में उपर्युक्त भिन्नता के अतिरिक्त और भी कुछ विशेष बातें द्रष्टव्य हैं। दोनों रूपान्तरों की कुछ विशेषताएँ खण्डों में विभाजित प्रतियाँ:-- खण्डों में अविभाजित प्रतियाँ :— (१) कथा चार खण्डों में समाप्त (१) केवल तीन खण्डों की कथा ही होती है। प्राप्य है। (२) माघ, कालिदास आदि पंडितों (२) इन नामों का अभाव है। का नाम आता है। (३) उड़ीसा यात्रा में साथ जाने (३) इन नामों का उल्लेख नहीं है। वाले सरदारों के नाम गिनाये गए हैं। (४) राजा के उड़ीसा जाने का मुहूर्त (४) रानी ज्योतिषी से चार माह रानी ज्योतिषी से एक माह बाद बाद का मुहूर्त राजा को देने के कर देने को कहती है। लिए कहती है। (५) वर खोजने के लिए जैसलमेर (५) यह वर्णन इस रूपान्तर की आदि जाने का विस्तृत वर्णन है। प्रतियों में विस्तार से नहीं है। (६) इस रूपान्तर की प्रतियों में (६) इस रूपान्तर में ग्रन्थ के शेष में रचनाकाल-सूचक पद्य ग्रन्थ रचना-सूचक पद्य आया है। के आदि में है। ऊपर प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों का विभाजन काल के अनुसार चार समूहों में किया गया है। प्रत्येक समूह की प्रत्येक प्रति उपर्युक्त दोनों रूपान्तरों में से किस रूपान्तर में आती है उसे निम्न रूप में स्पष्ट किया जा सकता है :— समूह खण्डों में अविभाजित खण्डों में विभाजित 'अ' संख्या १, ३, ४, संख्या २ 'आ' " ५, ७, ८, ९ " ६, १०, ११, १२, १३, ────────────────────────────────────────── (१) राजस्थानी—३रा भाग, अंक २, पृ०-१८।
- १२ - समूह खण्डों में अविभाजित खण्डों में विभाजित 'क' " १४, " X 'घ' " १५, १६, १७, १८, " X १९, २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६, २७ । विभिन्न समूहों के इस विश्लेषण द्वारा यही सिद्ध होता है कि खण्डों में अविभाजित रूपान्तर वाली प्रतियों में प्राचीनतम प्रति 'घ' समूह की संख्या एक वाली प्रति है, जो सं० १६३३ की लिखी हुई है तथा खण्डों में विभाजित रूपान्तर वाली प्रतियों में भी प्राचीनतम प्रति 'घ' समूह की संख्या २ वाली प्रति है जो सं०-१७६५ की लिखी हुई है। अतः इन्हीं दो प्रतियों को दोनों रूपान्तरों की प्रतिनिधि प्रति मान कर सम्पादन का कार्य किया गया है। प्राप्य हस्तलिखित ग्रन्थों में एक बात और विचारणीय है । ग्रन्थ में कथित घटना का सम्बन्ध जैसलमेर, अजमेर तथा मालवा से है । लेकिन इन स्थानों में से किसी भी स्थान में उपर्युक्त प्रतियाँ नहीं लिखी गईं । सम्पादन कार्य के लिए आधारित प्रथम रूपान्तर की प्रतिनिधि प्रति (१६३३) आगरा में लिखी गई है और द्वितीय रूपान्तर की प्रतिनिधि प्रति (१७६५) फूनसेड़ा में लिखी गई है। इसके अतिरिक्त १७५१ में रिणी, १७७२ में तेमरासर, १७७५ में मालवपुरा तथा १८२६ में बीकानेर में लिखी हुई प्रतियाँ हैं। अन्य प्रतियों में लेखन-स्थान का उल्लेख नहीं है । भविष्य में यदि कोई प्रति घटित स्थान की लिखी हुई प्राप्त हो सकी, तो विशेष महत्त्व की हो सकती है । घटना से सम्बन्धित स्थानीय कवि द्वारा, यदि नाल्ह कवि द्वारा कही गई घटना का वर्णन किया जाय तो निःसन्देह भाषा, ऐतिहासिक तथ्य आदि में साम्य मिलेगा चाहे स्थानीय कवि द्वारा घटना का वर्णन शतियों के पश्चात् ही क्यों न हो। ग्रन्थ की रचना तिथि अनेक विद्वानों ने ग्रन्थ की रचना-तिथि पर अपना अपना मत विविध रूप से विवेचन करते हुए प्रकट किया है । सबसे पहले डा० श्यामसुन्दर दास ने इस विषय पर अपना मत प्रकट किया सन् १९०० की खोज रिपोर्ट में। वे कहते हैं कि "The author of the chronicle is Narapati Nalha as he gives the date of the composition of this book as Sam. 1220 This is not the Vikram Era, for the 9th day of the dark half of Jaistha does not fall on Wednesday as mentioned in the book according
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to the calculations of the Vikrama Era. The date of the compo- sition of the book would therefore be in the year 1298 of the Christian era."1 लाला सीताराम बी० ए० ने सन् १९०० की खोज रिपोर्ट वाली प्रति पर निर्भर होकर ग्रन्थ की रचना-तिथि पर अपना विचार यों प्रकट किया कि "Nalha is not mentioned in the modern vernacular literature of Hindustan According to Misrabandhu Vinod Nalha was a Raja & composed his Visaldeo Rasau in 1354 V E corr sponding to A. D. The date of composition is given in the following lines "बारह सौ बहत्तीरा मझारि, जेठ वदी नवमी बुधवारि । नाल्ह रसायन आरंभइ, सारदा तूठी ब्रह्म कुमारि ॥ The date is clearly 1272 and 1220 as the Misra Brothers say, and their calculation showing thus that is inaccurate, therefore based on wrong date. 1272 V. E will correspond to 1216 A. D and we have reasons to believe that was a contem- porary of Bisaldeo * आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कहना है कि ग्रन्थ में निर्माण काल यों दिया है- बारह सै बहोत्तरी मझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ नाल्ह रसायन आरंभइ । सारदा तूंठि ब्रह्म कुमारि ॥ बारह सौ बहोत्तरा का स्पष्ट अर्थ १२१२ है। बहोत्तरा शब्द 'बारहोत्तर द्वादशोत्तर का रूपान्तर है। अतः 'बारह सौ बहोत्तरा' का अर्थ द्वादशोत्तर बारह सौ अर्थात् १२१२ होगा। गणना करने पर विक्रम स० १२१२ में ज्येष्ठ बदी नवमी को बुधवार ही पड़ता है।३ डा० रामकुमार वर्मा ने रचना विधि सम्बन्धी 'बारह सौ बहोत्तरा मझारि । जेठ वदी नवमी बुधवारि ॥' तथा 'संवत् सहस विहुत्तराइ आणि नाल्ह कविसर सरसीय वाणि' दोनों पद्यों पर विचार करते हुए कहा है कि १००३ इतिहास के † Annual Report on the Search for Hindi Mss for the year 1900, P. P 78-79.
- Selections from Hindi Literature-Book 1 [Vardic Poetry) PP. 38 39 ३-हिन्दी साहित्य का इतिहास-पृ० २४ सं० २००३ ।
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अधिक समीप है । यदि रासो की एक प्रति हमें यही संवत् देती है और इतिहास बीसल देव के समय को भी लगभग यही मानता है तो हमें बीसलदेव रासो की रचना १०७३ मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।' श्री सत्यजीवन वर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के उपर्युक्त मत को मानते हुए कहते हैं कि नरपति नाल्ह का दिया हुआ बीसलदेव रासो का संवत् १२१२ माननीय है ।^२ मिश्र बन्धुओं ने 'बहत्तोरोत्रा' का अर्थ 'बीस' माना है । आप लोग लिखते हैं कि 'नरपति नाल्ह ने इसका समय १२२० लिखा है । पर जो तिथि उन्होंने बुधवार को ग्रन्थ निर्माण की लिखी है वह १२२० संवत् में बुधवार को नहीं पड़ती । परन्तु १२२० शाके बुधवार को पड़ती है । इससे सिद्ध होता है कि रासो १२२० साके में बना, जिसका वि० सं० १३५७ है ।'^३ श्री अगरचन्द जी नाहटा ने विभिन्न प्राप्त प्रतियों के अनुसार रासो की रचना का संवत् १००३, १०७३, १२१२, १२०२, १२०३, १३०७, तथा १३०७ निकाला । लेकिन इन सभी संवतों में से उन्होंने सं० १२०२ को ( बारह सै बहत्तोरोत्तरा का अर्थ नाहटा जी ने १२०२ लिया है, १२१२ नहीं ) ही ठीक माना है क्योंकि जंत्रो के अनुसार इसकी तिथि नक्षत्र आदि मिल जाते हैं ।'^४ प्रसिद्ध विद्वान् डा० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने नाहटा जी द्वारा उपस्थित की हुई सारी तिथियों की जाँच करते हुए 'बारह सै बहत्तरां हा मझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ।' को ही ठीक माना है । इसके पक्ष में अपना तर्क देते हुए वे कहते हैं कि 'राजपूताने में पहले विक्रम संवत् कही चैत्रादि ( चैत्र शु० १ से आरम्भ होने वाला ) और कहीं कार्त्तिकादि ( कार्त्तिक शु० १ से आरम्भ होने वाला ) चलता था । जैसा कि वहाँ से मिलने वाले शिला लेखों, दान पत्रों और पुस्तकों से पाया जाता है । चैत्रादि वि० सं० १२०२ ज्येष्ठ व० ९ को शुक्रवार था और कार्त्तिकादि वि० सं० के अनुसार ( अर्थात् चैत्रादि १२०३ ) उक्त तिथि का बुधवार आता है । ऐसी दशा में हस्तलिखित प्रतियों
१- हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- पृ० २०८-२१० । २- बीसलदेवरास भूमिका पृ० ५-६ । ३-मिश्रबन्धु विनोद-भाग १, पृ० २०६ । ४-राजस्थानी- त्रैमासिक पत्रिका, भाग ३, पृ० २१ ।
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के आधार पर कार्त्तिकादि वि० सं० १२०२ (चैत्रादि १२०१) ही को इसका रचनाकाल मानना पड़ता है ।¹ डा० उदयनारायण तिवारी को भी यही तिथि मान्य है ।² डा० माताप्रसाद गुप्त कहते हैं कि प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों के चार पाठों के आधार पर कम से कम छह तिथियाँ निकलती ही हैं :- १-स० १०७७-समूह 'क' २-स० १०७३-समूह 'ख' । ३-,, १२७७-समूह 'घ' ४-स० १२०७-समूह 'घ' । ५-,, १२०२-समूह 'स' ६-स० १२१२-समूह स० । चैत्रादि और कार्त्तिकादि-दो प्रकार के वर्षों के अनुसार इन छ की बारह तिथियाँ बन जाती हैं, और यदि गत और वर्तमान संवत् लिये जायें तो उपर्युक्त से कुछ २४ तिथियाँ होती हैं । यदि और आगे अमान्त और पूर्णिमान्त मासों के भेदों पर न भी आए, तो ये चौबीस तिथियाँ क्या कम हैं ? गणना करने पर इन चौबीस में कोई न कोई ठीक निकल ही आयेगी । गणना करके महामहोपाध्याय स्वर्गीय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने स० १२०१ की तिथि को कार्त्तिकादि वर्ष में होने पर गणना से ठीक बताया था ! किंतु असंभव नहीं है कि उपर्युक्त चौबीस तिथियों की गणना करने पर दो एक और भी ठीक निकल आवें । फिर १२३२ का पाठ स० समूह का है जो, पाठ की दृष्टि से यद्यपि समिश्रित है, किन्तु अत्यधिक प्रक्षेपपूर्ण है । वस्तुत यही समूह सबसे अधिक प्रक्षेपपूर्ण है । ऐसी दशा में इन पाठों के आधार पर ग्रन्थ की रचना तिथि निर्धारित करना उचित नहीं जान पड़ता ।³ बीसलदेव रासो के निर्माणकाल की उपर्युक्त आलोचना से निष्कर्ष यह निकलता है कि डा० गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा, श्री अगरचन्द नाहटा तथा डा० रामकुमार वर्मा को छोड़कर किसी अन्य विद्वान् ने "बारहसै बहोत्तरा" के अतिरिक्त अन्य तिथियों पर विचार नहीं किया । इस शब्द के अर्थ भी दो लगाये गये । एक अर्थ १२०२ लगाया गया तथा दूसरा अर्थ १२१२ । पहले अर्थ को मानने के पक्ष में श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, श्री अगर चन्द जी नाहटा, लाला सीताराम, तथा डा० उदयनारायण तिवारी हैं । १-नागरी प्रचारिणी पत्रिका-सं० १६६७, अंक २, पृ० १६३ १६५ । २-वीर काव्य-पृ० १६१ । ३-बीसलदेव रास पृ० ५१-५२ ।
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१२१२ के पक्ष का समर्थन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डा० श्यामसुन्दर दास (इन्होंने इस सम्बन्ध में अपने उपर्युक्त विचार को पीछे से बदल दिया था और सं० १२१२ का समर्थन करने लगे थे)¹ तथा सत्यजीवन वर्मा करते हैं। मिश्रबन्धुओं का अपना एक पृथक् वर्ग है, जो इसका अर्थ सं० १३५४ वि० लेता है। डा० रामकुमार वर्मा ने १०७३ को इसका निर्माण-काल माना। डा० माताप्रसाद गुप्त किसी तिथि का समर्थन नहीं करते। किसी भी कवि की कृति के निर्माण काल का निर्णय दो ही प्रकारों से हो सकता है। प्रथम और पुष्ट आधार तो है, उसकी कृति में दिया हुआ काल, जिसे अन्तःसाक्ष्य कहा जाता है, द्वितीय आधार है बाह्य साक्ष्य जिसमें कवि द्वारा वर्णित विषयवस्तु यदि रचना ऐतिहासिक हुई तो तथा भाषा आदि हस्त- लिखित प्रस्तुत कृति में हमें दोनों आधार प्राप्य हैं। अन्तः साक्ष्य का आधार प्राप्य प्रतियाँ हैं जिसमें हमें निम्न तिथियाँ निर्माण काल की प्राप्त होती हैं— 'अ' समूह : १. संवत सहस सतिहत्तरइ जाणि। रोहिणी नक्षत्र सोहामण्ड ॥ सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास। २. बारह सै बहोत्तरा हो मझारि। जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ ३ संवत सहंस तिहत्तरइ। सुकल पक्ष पंचमइ श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोहामणो॥ 'आ' समूह : ४. श्रावण शुक्ल ५ रो० 'क' समूह : ५ १०७३ 'ख' समूह : ६. संवत तेर सतोत्तरै जाणि। सुक पंचमी गइ श्रावण मास। हस्त नक्षत्र रविवार सु। उपर्युक्त अन्वय का अर्थ यह निकला कि 'अ' समूह की चार प्रतियों में हमें चार तिथियाँ मिलती हैं, १- १०७३, २- १२७२, ३- १०७३ तथा १—वीरकाव्य, पृ० १८६ ।
- २४ - ४-१३०७ । 'घा' समूह की ६ प्रतियों में से चार प्रतियों में १०७७, एक में १२७२, दो में १००३, एक में १००३ जो कि भूल से लिखा प्रतीत होता है, तथा एक में सम्वत् नहीं मिलता है। 'क' समूह की प्रति में १००३ का उल्लेख है। 'ख' समूह की चौदह प्रतियों में से एक में १०७७, छः में १०७३ तथा दो में १३०७ के अतिरिक्त अन्य प्रतियों में रचनातिथि नहीं मिलती। इन संवतों में से १०७७ तथा १००३ को छोड़कर अन्य दो संवतों, १२७२ तथा १३०७ के दो अर्थ लगाये जाते हैं। १२०२ से १२१२ का भी अर्थ लगाया जाता है और इसी प्रकार १३०७ का अर्थ १२०७ भी विद्वान् लगाते हैं। विक्रमी संवतों के दो प्रकार के व्यवहार¹ (चैत्रादि और कार्तिकादि) उपयुक्त संवतों की बारह तिथियाँ देते हैं। लेकिन जिस प्रान्त की यह कथा है वहाँ प्रायः संवत् कार्तिक सुदी प्रतिपदा से आरम्भ होता है। एलेग्जेन्डर कनिंघम साहब कहते हैं— "The Vikrama Sambat, or era of Vikramaditya, is reconed from the vernal equinox of the year 57 B. C. and the comple- tion of the Kaliyuga year 3044. It is used all over northern India except in Bengal where the Saka era has been generally adopted. It is used also in Telingana and Gujrat, but in the latter province the year does not begin untill seven months later than in the north or with the first of Kartik Sudi. कनिंघम साहब के मत की पुष्टि प० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा भी एक प्रकार से करते हुए कहते हैं कि राजपूताने में पहले विक्रम संवत् कहीं चैत्रादि (चैत्र सु० १ से आरम्भ होने वाला) और कहीं कार्तिकादि (कार्तिक सु० १ से आरम्भ होने वाला) चलता था, जैसा कि वहाँ से मिलने वाले शिला लेखों, दान पत्रों और पुस्तकों से पाया जाता है।² चूँकि पं० गौरी- शंकर हीराचन्द जी ओझा के मतानुसार राजपूताने में कहीं चैत्रादि और कहीं कार्तिकादि संवत् प्रारम्भ होता है इसलिए बीसलदेव रासो की प्राप्य प्रतियों [ के छः संवतों के १२ संवतों का (चैत्रादि और कार्तिकादि के हिसाब से) तथा कनिंघम साहब के मतानुसार केवल छः संवतों की तिथि, वार आदि की गणना १—Book of Indian bras—Alexender cunningham—P. 47. २—ना० प्र० प०, स० १६६७, अंक २, पृ ० १६३ ।
-३२५ - की कसौटी पर कस कर देखना होगा कि प्राप्य संवतों में से किस संवत् को तिथि, वार आदि गणना की कसौटी पर खरे उतरते हैं । प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों में, प्राचीनतम संवत् हमें १०७७ मिलता है संवत् १६६३ की प्राप्य प्रति में, जो अबतक की प्राप्य प्रतियों में सबसे प्राचीन है, भी यही संवत् दिया हुआ है । इस संवत् के साथ तिथि श्रावण सुदि ५ तथा नक्षत्र रोहिणी दिया हुआ है । वार इसमें नहीं है । चैत्रादि संवत् के अनुसार वि० सं० १०७७ श्रावण शुक्ला ५ को गुरुवार और हस्त नक्षत्र था और कार्त्ति- कादि संवत् के अनुसार उक्त तिथि को सोमवार और हस्त नक्षत्र आता है ।¹ यदि दिन के उल्लेख के अभाव के कारण किसी प्रकार इस संवत् को ग्रंथ का रचना-काल मान भी लिया जाय तो नक्षत्र की विभिन्नता इस संवत् को मानने में बाधा उपस्थित करती है । दूसरा प्राप्य संवत् १००३ है । इस संवत् के साथ मास, पक्ष, तिथि, वार आदि कुछ नहीं है, इसलिए इस सम्बन्ध में कोई जाँच सम्भव नहीं । इसके पश्चात् विचारणीय संवत् १२७२ है जिसका दूसरा अर्थ १२१२ भी लगाया गया इस संवत् के साथ तिथि तथा वार का उल्लेख है, नक्षत्र का नहीं । पं० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा का मत है कि चैत्रादि विक्रम संवत् १२७२ ज्येष्ठ बदी शुक्रवार था तथा कार्त्तिकादि वि० सं० के अनु- सार अर्थात् चैत्रादि १२७३ में उक्त तिथि को गुरुवार आता है । दिन मिल जाने के कारण ओझाजी ने इसी संवत् को ग्रंथ की रचना-तिथि माना है² । इस संवत् के दूसरे अर्थ का अर्थात् १२१२ का समर्थन आचार्य रामचन्द्र जी शुक्ल तथा श्री सत्यजीवन जी वर्मा करते हैं । इन लोगों के मतानुसार गणना करने पर विक्रम सं० १२१२ में ज्येष्ठ बदी ६ को ही बुधवार पड़ता है ।³ श्री सत्यजीवन जी वर्मा का तो यहाँ तक कहना है कि "सं० १२७२ में जेठ बदी नवमी बुधवार को नहीं पड़ती ।⁴ इस संवत् के सम्बन्ध में उपर्युक्त विद्वानों के दो विपरीत मतों ने एक विषम समस्या उपस्थित कर दी है । सं० १२१२ में भी जेठ बदी ६ को बुधवार का पड़ना और १२७२ में भी उसी तिथि को बुधवार का पड़ना, एक ऐसी समस्या है जिस पर विचार करना आवश्यक है । खेद है 1 Indian Ephemaris, vol III, PP 43, 45 २. ना० प्र० प०, १९६७, अंक २, पृ० १६३ । ३. हिन्दी साहित्य का इतिहास सं० २००३, पृ० २४ । ४. बीसलदेव रासो—पृ० ५ भूमिका ।
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कि उपर्युक्त विद्वानों में से किसी ने यह बताने का कष्ट नहीं दिया कि किस आधार पर उन लोगों ने गणना की। इण्डियन एफीमेरीज के विद्वान् लेखक ने गणना कर विभिन्न संवतों के जो दिन और नक्षत्र आदि दिये हैं उसके अनुसार चैत्रादि के १२०२ की जेठ बदी ६ को शुक्रवार "शतभिषक्" नक्षत्र पड़ता है तथा कार्त्तिकादि से प्रारम्भ होने वाले इस संवत् की जेठ बदी ६ को शुक्रवार हस्त नक्षत्र पड़ता है।¹ इस संवत् के पाठ का जो दूसरा अर्थ १२१२ लगाया गया है उसके सम्बन्ध में भी उप- युक्त पुस्तक में जो उल्लेख प्राप्य है उसके अनुसार चैत्रादि जेठ बदी ६ को बृहस्पतिवार और रेवती नक्षत्र तथा कार्त्तिकादि जेठ बदी ६ को बुधवार और हस्त नक्षत्र था²। इस गणना की दृष्टि से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और श्री सत्यजीवन वर्मा का यह मत कि संवत् १२१२ में जेठ बदी ६ को बुधवार पड़ता है, ठीक है। इन संवतों के अतिरिक्त एक संवत् १३७७ भी प्राप्य है। इस संवत् के साथ तिथि, वार तथा नक्षत्र सभी दिया हुआ है। अतः गणना करने में बड़ी सुविधा है। गणना करने पर चैत्रादि संवत् के अनुसार विक्रम संवत् १३७७ श्रावण सुदी ५ को रेवती नक्षत्र और शनिवार था तथा कार्त्तिकादि संवत् के अनुसार उक्त तिथि को अश्विनी नक्षत्र और बृहस्पतिवार आता है³। इस तरह यह संवत् भी अशुद्ध ठहरता है। इस संवत् का दूसरा अर्थ १३०७ भी लगाया गया है। गणना करने पर चैत्रादि संवत् १३०७ श्रावण शुक्ल ५ को बुधवार तथा "ह० भाद" पड़ता है एवं कार्त्तिकादि संवत् १३०७ "अर्थात् चैत्रादि १३०८" श्रावण शुक्ल ५ को मंगलवार और अश्विनी नक्षत्र पड़ता है⁴। उपर्युक्त प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों में उल्लेख किये गये विभिन्न संवतों की गणना का निष्कर्ष यह निकला कि संवत् १२०२ के पाठ का अर्थ १२१२ निकालने पर और कार्त्तिकादि से इस संवत् का प्रारम्भ मानने पर जेठ बदी ६ को बुधवार पड़ता है जो कि संवत् १६६३ वाली प्रति में दिये गये पाठ का लगाया गया अर्थ है; लेकिन इसे मानने में इस संवत् के साथ नक्षत्र के उल्लेख का अभाव तथा इस प्रति के चार खण्डों में विभाजित होने के कारण इसके प्रामाणिक होने में सन्देह तथा बारह से बहोत्तरा का लगाया गया अर्थ १२१२,
1 Indian Ephemaries vol IV, P. P 32, 34 2 ,, ,, vol III, P P 312, 314. 3 ,, ,, vol IV, P. P. 243, 245 4. ,, ,, vol IV, P. P. 103, 105.
- २७ - आदि कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके कारण इस तिथि को पूर्ण रूप से केवल दिन मिल जाने के कारण प्रामाणिक मानना उपयुक्त न होगा। अन्त में कहना पड़ेगा कि प्राप्य संवतों के आधार पर बीसलदेव रासो की रचना तिथि का निर्णय करना शंकाओं से निर्मुक्त नहीं हो सकता । प्राप्य प्रतियों में प्रति नं० २ ( १६६१ ) तथा ६ ( १७२४ ) ऐसी हैं जिनमें रचना तिथि प्रारम्भ में तथा अन्य प्रतियों में अन्त में दी गई है । इस आधार पर श्री अगरचन्द जी नाहटा ने यह तर्क उपस्थित किया है कि "ग्रन्थ के प्रारंभ में रचना काल का निर्देश करना मुसलमान ग्रन्थकारों की शैली है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में रचना-काल जहाँ दिया है वहाँ सदा ग्रन्थ के अन्त में ही दिया है प्रारम्भ में देने की पद्धति मुसलमानों की देखादेखी सोलहवीं शताब्दी के आस पास चली जान पड़ती है १।" लेकिन इस आधार पर यह कहना कि बीसलदेव रासो का रचयिता १६ वीं शताब्दी के लगभग का था, तर्करहित जान पड़ता है । रचना का समय ग्रन्थ के प्रारम्भ अथवा अन्त में देना रच- यिता की रुचि का प्रश्न है । प्राचीन ग्रंथों में जहाँ अनेक उदाहरण रचना तिथि को अन्त में देने के मिलते हैं वहाँ कई ग्रंथ ऐसे भी मिलते हैं जहाँ रचना तिथि प्रारम्भ में दी गई है। "जैन कवि" मान रचित "राजविलास" नामक ग्रन्थ में उसकी रचना का समय प्रारम्भ में ही स्तुतियों के बाद दिया गया है २।" ऐसे और भी अनेक उदाहरण प्राप्त हो सकते हैं । भाषा का दृष्टिकोण ग्रन्थों के रचना-काल पर भाषा की दृष्टि से भी विचार किया जाता है । श्री अगरचन्द जी नाहटा ने इस दृष्टिकोण से विचार करते हुए लिखा है कि "बीसलदेव रासो" की भाषा सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी की राजस्थानी भाषा है । जिन विद्वानों ने ग्यारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक की राजस्थानी भाषा का अध्ययन किया है, उनका यह मत हुए बिना नहीं रह सकता । ग्रंथ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम-नहीं के बराबर है। ३ और इस प्रसंग में पाद टिप्पणी देते हुए वे लिखते हैं कि "सोलहवीं शताब्दी में नरपति नाम का एक कवि हुआ भी है जिसका उल्लेख "जैन गुर्जर कवियों" भाग १ में है ४ । १. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० १६ ( पाद टिप्पणी ) २ नागरी प्रचारिणी पत्रिका-स० १६६७, पृ० १७१ ३. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० २१ ४. " " " " ( पाद टिप्पणी )
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इन्हीं आधारों पर ये शायद कहना चाहते हैं कि यह रचना १६ वीं शताब्दी की है और उसका रचयिता भी १६ वीं शताब्दी का है। लेकिन जिन प्रतियों की भाषा के आधार पर श्री नाहटाजी ने यह परिणाम निकाला है उन प्रतियों में ग्रंथ की अन्तिम स्थितियों तक की भाषा का मिश्रण हुआ है। फिर उनका यह कहना कि ग्रन्थ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम नहीं के बराबर है" स्वयं यह सिद्ध करता है कि ग्रन्थ की भाषा में प्राचीन के कुछ उदाहरण प्राप्त हैं। उत्तरोत्तर उसमें अनेक प्रकार की बोलियों का मिश्रण शताब्दियों के व्यतीत होने के साथ-साथ होता गया। हमें सत्रहवीं शताब्दी की प्राचीनतम प्रति प्राप्त है। यदि ग्रन्थ का रचना-काल दी गयी रचनातिथि के अनुसार ११ वीं या १२ वीं शती मान लिया जाय तब भी प्राप्त प्रतियाँ तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् की रचित हैं। अतः तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् उस काल की भाषा का जिस काल में यह ग्रन्थ मूल रूप से रचित हुआ था, प्राप्त होना असम्भव है। प्रसिद्ध विद्वान् पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी की भाषा के कुछ उदाहरणों को देते हुए कहा है कि "भाषा का प्रयोग कवि की रुचि पर निर्भर है। जैनों के धर्मग्रन्थ (सूत्र) प्राकृत (अर्ध मागधी) भाषा में होने के कारण जैन लेखक अपने भाष्य काव्यों में प्राकृत शब्दों की भरमार करते रहे हैं, जिससे उनकी भाषा दुरूह हो गयी है। चारण, भाट आदि प्राकृत से अधिक परिचित न होने के कारण अपनी रचनाएं प्रचलित भाषा में करते थे, जिससे इन दोनों प्रकार के लेखकों की पुस्तकों की भाषा में अन्तर होना स्वाभाविक ही है। भाषा की कसौटी सदियाँ नहीं हैं। एक ही समय में कोई सरल भाषा में अपनी रचना करता है तो कोई कठिन भाषा का प्रयोग करता है।' डा० उदयनारायण तिवारी भी पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की बातों को पुष्ट करते हुए लिखते हैं कि "भाषा के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है कि क्या इसकी भाषा उस समय की साहित्यिक भाषा है या सर्व- साधारण के बोलचाल की भाषा ? अथवा सम्भव है कि वह उन दोनों में से एक भी न हो। इस सम्बन्ध में इस बात को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जैन लेखक तथा कवि प्राकृत (अर्द्ध मागधी प्राकृत तथा अपभ्रंश) का ही प्रयोग
१. ना० प्र० प०—सं० १६६७, पृ० १०१ ।
- २९ - अपनी कविताओं में करते थे : किन्तु साधारण चारण और कवि प्राकृत से अपरि- चित होने के कारण अपनी प्रचलित भाषा में ही रचना करते थे। नरपति नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न तो कोई सुकवि। अतएव उसके लिए अपनी मातृभाषा राजस्थानी में कविता करना सर्वथा स्वाभाविक था।१ कारकों के वियोगा तथा संयोगा अवस्थाओं के रूप, क्रियाओं के सहायक क्रिया से बने हुए तथा संस्कृत की ही भाँति मूल क्रिया में प्रत्यय जोड़ कर बने हुए रूप, राजस्थानी उच्चारण के अनुसार 'न' के स्थान पर "ण" का प्रयोग तथा संज्ञा शब्दों के अन्त में "दा", "दी" और "दे" आदि के प्रयोगों के उदा- हरणों को दिखाकर डा० उदयनारायण जी तिवारी ने यह सिद्ध किया है कि इसकी भाषा १२००—१३०० वि० संवत् की है।२ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह मत है कि यद्यपि गाने की चीज़ होने के कारण मूल रासो की भाषा में समयानुसार बहुत कुछ फेर-फार होता रहा है किन्तु लिखित रूप में रक्षित होने के कारण इसका पुराना ढाँचा बहुत कुछ बचा हुआ है। अपने इस कथन की पुष्टि करने के लिये वे रासो में प्रयुक्त कुछ शब्दों की ओर संकेत करते हैं, जैसे 'चित्तह' = चित्त में, "रणि" = रण में, "ईणी विधि" = इस प्रकार, "ईसउ" = ऐसा, "नेयर" = नगर, "पसाउ" = प्रसाद, "पयोधर" = पयोधर, इत्यादि ।३ विविध विद्वानों के भाषा-सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह ज्ञात होता है कि ग्रन्थ की भाषा प्राचीन है और वह सं० ग्यारहवीं तथा बारहवीं के लगभग की हो सकती है। सोलहवीं शताब्दी की तो कदापि नहीं जैसा कि श्री नाहटा जी ने कहा है; क्योंकि पृथ्वीराज रासो तथा बीसलदेव रासो की भाषा के तुल- नात्मक अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि बीसलदेव रासो की भाषा पृथ्वीराज रासो की भाषा से पुरानी है। उपर्युक्त भाषा सम्बन्धी विविध विद्वानों के प्रकाशित मतों से यह निष्कर्ष निकलता है कि रासो की भाषा ग्यारहवीं तथा बारहवीं शती के लगभग की हो सकती है। अब प्रश्न यह उठता है कि ग्यारहवीं और बारहवीं शती में भारत- वर्ष की भाषा कौन सी थी। डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या महोदय ने अलबेरूनी १. वीरकाव्य—पृ० २०० । २. वीरकाव्य—पृ० २००—२०३ । ३. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ४४।
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के भारत वर्णन का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक "भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी" में लिखा है कि लगभग १०२५ ई० में भारतीय आर्य भाषा दो रूपों में विभाजित थी, एक तो उपेक्षित ग्राम्य भाषा जिसका केवल साधारण जन में प्रचार था, और दूसरी शिष्ट, सुशिक्षित उच्च वर्ग में प्रचलित साहित्यिक भाषा, जिसे बहुत से लोग अध्ययन कर प्राप्त करते थे तथा जो व्याकरणात्मक विभक्ति, योग, व्युत्पत्ति, तथा व्याकरण के नियमों एवं अलंकार, रस शास्त्र की बारीकियों से बद्ध थी । इन दो रूपों के बावजूद भी वह भारतीय भाषा को एक ही गिनता है । सुसंस्कृत ब्राह्मण वर्ग संस्कृत की परम्परा को ही चलती रखता थी और उसके संरक्षक क्षत्रिय एवं अन्य नृपतिगण उसे आश्रय भी देते रहते...यद्यपि ये स्वयं तथा उनसे नीचे वर्ग की प्रजा अपभ्रंश तथा देशी भाषाओं मे ही अपना मनो- रञ्जन करते थे ।१ अलबेरूनी की उपर्युक्त उक्ति यह सिद्ध करती है कि ग्यारहवीं शती में भारत- वर्ष में संस्कृत तथा अपभ्रंश दो प्रकार की भाषाएँ प्रचलित थीं । कालान्तर में अपभ्रंश से ही नव्य भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ । संस्कृत की तरह अपभ्रंश का केवल एक ही भेद नहीं था । विभिन्न प्रान्तों में बोली जाने वाली अपभ्रंश भाषा का प्राकृत चन्द्रिका में सत्ताईस भेद गिनाया गया है :— व्राचड़ो लाटवैदर्भावुपनागरनागरी । बार्बरावान्त्य पांचाल टक्क मालव कैकयाः ॥ गौडोड्रैव पाश्चात्य पाण्ड्य कौन्तल सैंहलाः । कालिङ्ग प्राच्य कर्णाट काञ्चय द्राविड़ गौर्जराः ॥ आभीरो मध्य देशीयः सूक्ष्म भेद व्यवस्थितः । सप्त विंशत्यपभ्रंशाः येताल्लादिप्रभेदतः ॥ इन्हीं सत्ताईस प्रकारों के अपभ्रंशों में से एक अपभ्रंश जिसका नाम डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के मतानुसार सौराष्ट्रिय अपभ्रंश है, राजस्थान की ग्यारहवीं शती की भाषा थी । अपभ्रंश के उदाहरण हमें हेमचन्द्र आचार्य द्वारा रचित अपभ्रंश के व्याकरण तथा मेरुतुङ्गाचार्य कृत "प्रबन्ध चिन्तामणि" में अनेक मिलते हैं । नीचे इन दोनों ग्रंथों के दो-दो पद उदाहरण-स्वरूप इसलिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि इनकी भाषा की तुलना बीसलदेव रासो की भाषा से की जा सके ।
१. भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी, पृ० १०६-१०७ ।
- ३१ - पुत्ते जाएँ कवणु गुणु अवगुणु कवणु मुएण । जा बप्पी की भुंहड़ी चंपिज्जइ अवरेण ॥ "अपभ्रंश व्याकरण, हेमचन्द्र आचार्य" जेवडु अंतरु रावण रामहं तेवडु अंतरु पट्णगामहं । "वही" जा मति पच्छइ संपज्जइ सामति पहिली होइ । मुंज भणइ मृणालवइ विघन न वेढइ कोइ । "प्रबन्ध चिन्तामणि" जइ यह रावणु जाइयउ दहमुहु इक्कु सरीरु । जणणि वियंभी चिंतवइ कवणु पियावडं खीरु ॥ "वही" उपर्युक्त उदाहरणों में : बीसलदेव रास में : संज्ञा संज्ञा पुत्तैँ, बप्पी, पट्टण घूमडा, सेजटी, मोजडी, रामहं, दह, मुंढ, इक्कु भाटणि, नयण, घहरणि, सरीरु, जणणि, खीरु पतउड, ग्रीपणउ, सुपिनउ, भुंहडी आदि । तनरु, आदि । क्रिया क्रिया भजइ, वेढइ, चिंतवइ, भयइ, गियइ, जडइ, पियावडं आदि । ओलावइ, आदि । संज्ञा और क्रिया के रूप जैसे "अपभ्रंश व्याकरण" और प्रबन्ध-चिन्तामणि में हैं वैसे ही बीसलदेव रासो में भी हैं । हेमचन्द्र आचार्य के व्याकरण का रचना- काल वि० संवत् १२०० के लगभग और प्रबन्ध चिन्तामणि का संवत् १३६१ है, लेकिन हेमचन्द्राचार्य के व्याकरण में उद्धृत की हुई पंक्तियाँ उदाहरण-स्वरूप आई हैं । अतः निश्चय ही ये पंक्तियाँ ग्रन्थ की रचना के पहले की हैं । इसी प्रकार "प्रबन्ध चिन्तामणि" की भाषा के लिए भी कहा जा सकता है कि जिस अपभ्रंश के व्याकरण का उल्लेख इसमें हुआ है वह इस ग्रंथ की रचना के बहुत पहले जन-साधारण की भाषा रही होगी और उसके पश्चात् ही "प्रबन्ध चिन्ता- मणि" के रचयिता ने उसी भाषा के संस्कृत रूप को अपने ग्रन्थ में स्थान दिया
- १२ - होगा । अस्तु, इसकी भाषा भी संवत् १२६१ से पहले की है, इसमें सन्देह नहीं । बीसलदेव रासो की भाषा जैसा कि ऊपर उदाहरणों द्वारा दर्शाया गया है "अपभ्रंश व्याकरण" और "प्रबन्ध चिन्तामणि" में उद्धृत उदाहरणों की भाषा से बहुत अंशों में मिलती जुलती है । भाषा के उपर्युक्त आधार पर निर्भर होकर ऐसा कहा जा सकता है कि बीसलदेव की रचना ग्यारहवीं शताब्दी के उत्त- रार्द्ध और १२ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुई होगी। लेकिन भाषा के आधार पर उपर्युक्त निर्णय करने में डा० उदयनारायण जी तिवारी द्वारा निकाला गया यह निष्कर्ष कि चूँकि नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न कोई सुकवि, अतएव उसने अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में बीसलदेव रासो की रचना की, बाधा उपस्थित करता है, यद्यपि डा० तिवारी का यहाँ "राजस्थानी" कहना अस्पष्ट है, क्योंकि इसके द्वारा उनका संकेत किस ओर है, इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता । यदि डा० तिवारी का उद्देश्य 'राजस्थानी' से शौरसेनी अपभ्रंश से हो, तब तो उपर्युक्त निकाले गये निष्कर्ष से उनका मन्तव्य सिद्ध होता है, और यदि उनका अर्थ राजस्थानी से पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान की बोलियों से है तब यह विचार करना होगा कि ये बोलियाँ कब से राजस्थान में प्रचलित हुईं । इन बोलियों के सम्बन्ध में डा० सुनीतिकुमार जी चाटुर्ज्या का कहना है कि पुरानी पश्चिमी राजस्थानी साहित्य 'अर्थात् पुरानी मारवाड़ी, गुजराती साहित्य' का इतिहास ई० चौदहवीं सदी के द्वितीयार्द्ध से शुरू हुआ, मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से, 'जो शौरसेनी से निकट सम्बद्ध होती हुई भी उसे स्वतन्त्र अपभ्रंश थी ऐसा अनुमित होता है-इसे हम "सौराष्ट्र अपभ्रंश" कह सकते हैं । पुरानी पश्चिमी राजस्थानी का उद्भव, तेस्सीतोरी के मतानुसार, ईस्वी तेरहवीं शती में हुआ था । गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पण्डितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी राजस्थानी में साहित्य सर्जना होने लगी, पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा में पूर्ववत् काव्यादि साहित्यिक रचना की नीति अन्वाहित रही । फिर, यह शौर- सेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बढ़ती गयी, इसका एक नवीन या अर्वाचीन रूप, पिंगल नाम से, राजस्थान और मालव के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुई, पिंगल का एक साहित्य बन गया। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने पिंगल की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई, जो "डांगल" या 'डिंगल' नाम से अब परिचित है। डिंगल काव्य ईस्वी पन्द्रहवीं शती से उपलब्ध है। ज्यादातर इसकी शब्दावली साहित्यिक थी,
३ - ३३ - अर्थात् प्रचलित मौखिक मारवाड़ी की शब्दावली से पृथक् होती थी ।१ प्रसिद्ध विद्वान् तेस्सीतोरी और डा० चाटुर्ज्या का उपर्युक्त मत यह सिद्ध करता है कि मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से राजस्थानी का उदय तेरहवीं शती में हुआ था । अर्थात् इसके पहले वहाँ की बोलचाल की भाषा अपभ्रंश थी । तथा अपभ्रंश के बाद "पिंगल" और तब डिंगल का स्थान आता है । आज के प्राप्त इस ग्रंथ की प्रतियों में निस्सन्देह डिंगल और पिंगल भाषा की बहुलता है, क्योंकि १५ वीं शती के पश्चात् की ही ये सभी प्रतियाँ हैं लेकिन इन प्रतियों में अपभ्रंश संज्ञाओं और क्रियाओं का प्रयोग तो स्पष्ट सिद्ध करता है कि इस काव्य की रचना अति प्राचीन अर्थात् १२ वीं शती की थी और स्मरण के आधार पर लिखित होने के कारण केवल थोड़े बहुत शब्दों और क्रियाओं का ही प्रयोग लेखबद्ध करते समय किया जा सका । तथा इस कथन में भी अत्युक्ति न होगी कि इस ग्रन्थ की रचना आजकल की राजस्थानी में नहीं हुई थी, जैसा कि डा० उदयनारायण जी तिवारी का विचार है, यदि उन्होंने सच- मुच राजस्थानी शब्द का प्रयोग आज की राजस्थानी के लिए किया हो । ऐतिहासिक दृष्टिकोण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना-तिथि पर विचार करते हुए डा० रामकुमार वर्मा ने सं० १००३ को इतिहास के निकट माना है और अपने मत की पुष्टि में इतिहास के प्रमाण दिये हैं ।२ ( लेकिन राजा भोज और बीसलदेव के समय को देते हुए भी वे यह कहना भूल गये कि किस बीसलदेव की चर्चा वे कर रहे हैं, क्योंकि इतिहास में बीसलदेव चार हो चुके हैं । ) श्री सत्यजीवन वर्मा ने सं० १२१२ को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ठीक सम- झते हुए कहा है कि "बीसलदेव" विग्रहराज चतुर्थ का दूसरा नाम है । बीसल- देव के शिलालेख सं० १२१० और १२२० के प्राप्त हैं । अजमेर बसने के पश्चात् केवल वही बीसलदेव हुआ है । यह अर्णोराज का पुत्र और जगदेव का छोटा भाई था । यह अपने बड़े भाई जगदेव के जीते जी उससे राज छीन कर गद्दी पर बैठा था । इसको विद्या से बड़ा प्रेम था । इसका रचा हुआ हर- केलिनाटक है । यह नाटक वि० सं० १२१० ( सन् ११५३ ) की माघ शुक्ला १. राजस्थानी भाषा...डा० सुनीति कुमार चाटुर्ज्या...पृ० ६५ । २. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २६८-१० ।
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पद्धती को समाप्त हुआ था। यह सन् ईसय् में खुदाई करने पर प्राप्त हुआ है। इसी स्थान में बीसलदेव द्वारा स्थापित पाठशाला थी। दिल्ली के प्रसिद्ध फीरोज शाह की लाट पर वि० स० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का इसका एक लेख भी है। इत्यादि ।¹ श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने १६६१ की लिखी हुई प्रति के आधार पर ही अपना यह मत प्रकट किया है। उस प्रति में "बारह सै बहोत्तराहां मझारि" का ही उल्लेख है। जब यह प्रति श्री वर्मा जी द्वारा सम्पादित हुई थी तब तक वही प्राचीनतम प्रति मानी जाती थी। अतः श्री वर्माजी के लिये यह स्वाभाविक था कि वे इसमें दिये हुए रचना काल को ही ठीक मानें और उसकी पुष्टि में प्रमाण दें। लेकिन उनके लिए भी अच्छा यह होता कि वे अन्य प्रतियों की तिथियों पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेते और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अपना मूल्यवान विचार उपस्थित करते हुए प्राप्य तिथि की गणना भी कर लेते। डा० उदयनारायण जी तिवारी ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना तिथि पर विचार करते हुए कहा है कि यदि बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मान लिया जाय तो राजमती से उसके विवाह की कथा इतिहास के विरुद्ध ठहरती है। राजमती को बीसलदेव रासो में भोज की पुत्री कहा गया है और भोज का समय लगभग सं० १११२ के आस पास था। बीसलदेव चतुर्थ का समय सं० १२०७ से १२२० तक का माना गया है। इस प्रकार सौ वर्ष पूर्व के किसी व्यक्ति की पुत्री से विवाह होने की कथा बड़ी असङ्गत होगी।² इस आधार पर बीसलदेव रासो का नायक बीसलदेव चतुर्थ नहीं ठहरता। बीसलदेव तृतीय के पक्ष में बिजोलियाँ के शिलालेख का प्रमाण, जिसमें चौहानों की वंशावली दी गयी है तथा जिसमें विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया गया है, और अन्य शिलालेखों के प्रमाण, जिसके अनुसार भोज के भाई उदयादित्य का विग्रहराज तृतीय का समकालीन होना सिद्ध होता है, तथा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से होने की सम्भावना सिद्ध होती है, डा० उदयनारायण जी तिवारी देते हैं।³ विग्रहराज तृतीय का समय डा० उदयनारायण जी तिवारी ने स० ११५० वि० माना है। और ग्रंथ
१. बीसलदेव रासो—पृ० ६-७। २. वीर काव्य—पृ० १६३। ३. वीर काव्य—पृ० १६४।