बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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इन्हीं आधारों पर ये शायद कहना चाहते हैं कि यह रचना १६ वीं शताब्दी की है और उसका रचयिता भी १६ वीं शताब्दी का है। लेकिन जिन प्रतियों की भाषा के आधार पर श्री नाहटाजी ने यह परिणाम निकाला है उन प्रतियों में ग्रंथ की अन्तिम स्थितियों तक की भाषा का मिश्रण हुआ है। फिर उनका यह कहना कि ग्रन्थ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम नहीं के बराबर है" स्वयं यह सिद्ध करता है कि ग्रन्थ की भाषा में प्राचीन के कुछ उदाहरण प्राप्त हैं। उत्तरोत्तर उसमें अनेक प्रकार की बोलियों का मिश्रण शताब्दियों के व्यतीत होने के साथ-साथ होता गया। हमें सत्रहवीं शताब्दी की प्राचीनतम प्रति प्राप्त है। यदि ग्रन्थ का रचना-काल दी गयी रचनातिथि के अनुसार ११ वीं या १२ वीं शती मान लिया जाय तब भी प्राप्त प्रतियाँ तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् की रचित हैं। अतः तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् उस काल की भाषा का जिस काल में यह ग्रन्थ मूल रूप से रचित हुआ था, प्राप्त होना असम्भव है। प्रसिद्ध विद्वान् पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी की भाषा के कुछ उदाहरणों को देते हुए कहा है कि "भाषा का प्रयोग कवि की रुचि पर निर्भर है। जैनों के धर्मग्रन्थ (सूत्र) प्राकृत (अर्ध मागधी) भाषा में होने के कारण जैन लेखक अपने भाष्य काव्यों में प्राकृत शब्दों की भरमार करते रहे हैं, जिससे उनकी भाषा दुरूह हो गयी है। चारण, भाट आदि प्राकृत से अधिक परिचित न होने के कारण अपनी रचनाएं प्रचलित भाषा में करते थे, जिससे इन दोनों प्रकार के लेखकों की पुस्तकों की भाषा में अन्तर होना स्वाभाविक ही है। भाषा की कसौटी सदियाँ नहीं हैं। एक ही समय में कोई सरल भाषा में अपनी रचना करता है तो कोई कठिन भाषा का प्रयोग करता है।' डा० उदयनारायण तिवारी भी पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की बातों को पुष्ट करते हुए लिखते हैं कि "भाषा के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है कि क्या इसकी भाषा उस समय की साहित्यिक भाषा है या सर्व- साधारण के बोलचाल की भाषा ? अथवा सम्भव है कि वह उन दोनों में से एक भी न हो। इस सम्बन्ध में इस बात को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जैन लेखक तथा कवि प्राकृत (अर्द्ध मागधी प्राकृत तथा अपभ्रंश) का ही प्रयोग
१. ना० प्र० प०—सं० १६६७, पृ० १०१ ।