बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- २९ - अपनी कविताओं में करते थे : किन्तु साधारण चारण और कवि प्राकृत से अपरि- चित होने के कारण अपनी प्रचलित भाषा में ही रचना करते थे। नरपति नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न तो कोई सुकवि। अतएव उसके लिए अपनी मातृभाषा राजस्थानी में कविता करना सर्वथा स्वाभाविक था।१ कारकों के वियोगा तथा संयोगा अवस्थाओं के रूप, क्रियाओं के सहायक क्रिया से बने हुए तथा संस्कृत की ही भाँति मूल क्रिया में प्रत्यय जोड़ कर बने हुए रूप, राजस्थानी उच्चारण के अनुसार 'न' के स्थान पर "ण" का प्रयोग तथा संज्ञा शब्दों के अन्त में "दा", "दी" और "दे" आदि के प्रयोगों के उदा- हरणों को दिखाकर डा० उदयनारायण जी तिवारी ने यह सिद्ध किया है कि इसकी भाषा १२००—१३०० वि० संवत् की है।२ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह मत है कि यद्यपि गाने की चीज़ होने के कारण मूल रासो की भाषा में समयानुसार बहुत कुछ फेर-फार होता रहा है किन्तु लिखित रूप में रक्षित होने के कारण इसका पुराना ढाँचा बहुत कुछ बचा हुआ है। अपने इस कथन की पुष्टि करने के लिये वे रासो में प्रयुक्त कुछ शब्दों की ओर संकेत करते हैं, जैसे 'चित्तह' = चित्त में, "रणि" = रण में, "ईणी विधि" = इस प्रकार, "ईसउ" = ऐसा, "नेयर" = नगर, "पसाउ" = प्रसाद, "पयोधर" = पयोधर, इत्यादि ।३ विविध विद्वानों के भाषा-सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह ज्ञात होता है कि ग्रन्थ की भाषा प्राचीन है और वह सं० ग्यारहवीं तथा बारहवीं के लगभग की हो सकती है। सोलहवीं शताब्दी की तो कदापि नहीं जैसा कि श्री नाहटा जी ने कहा है; क्योंकि पृथ्वीराज रासो तथा बीसलदेव रासो की भाषा के तुल- नात्मक अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि बीसलदेव रासो की भाषा पृथ्वीराज रासो की भाषा से पुरानी है। उपर्युक्त भाषा सम्बन्धी विविध विद्वानों के प्रकाशित मतों से यह निष्कर्ष निकलता है कि रासो की भाषा ग्यारहवीं तथा बारहवीं शती के लगभग की हो सकती है। अब प्रश्न यह उठता है कि ग्यारहवीं और बारहवीं शती में भारत- वर्ष की भाषा कौन सी थी। डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या महोदय ने अलबेरूनी १. वीरकाव्य—पृ० २०० । २. वीरकाव्य—पृ० २००—२०३ । ३. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ४४।