भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 38
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के भारत वर्णन का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक "भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी" में लिखा है कि लगभग १०२५ ई० में भारतीय आर्य भाषा दो रूपों में विभाजित थी, एक तो उपेक्षित ग्राम्य भाषा जिसका केवल साधारण जन में प्रचार था, और दूसरी शिष्ट, सुशिक्षित उच्च वर्ग में प्रचलित साहित्यिक भाषा, जिसे बहुत से लोग अध्ययन कर प्राप्त करते थे तथा जो व्याकरणात्मक विभक्ति, योग, व्युत्पत्ति, तथा व्याकरण के नियमों एवं अलंकार, रस शास्त्र की बारीकियों से बद्ध थी । इन दो रूपों के बावजूद भी वह भारतीय भाषा को एक ही गिनता है । सुसंस्कृत ब्राह्मण वर्ग संस्कृत की परम्परा को ही चलती रखता थी और उसके संरक्षक क्षत्रिय एवं अन्य नृपतिगण उसे आश्रय भी देते रहते...यद्यपि ये स्वयं तथा उनसे नीचे वर्ग की प्रजा अपभ्रंश तथा देशी भाषाओं मे ही अपना मनो- रञ्जन करते थे ।१ अलबेरूनी की उपर्युक्त उक्ति यह सिद्ध करती है कि ग्यारहवीं शती में भारत- वर्ष में संस्कृत तथा अपभ्रंश दो प्रकार की भाषाएँ प्रचलित थीं । कालान्तर में अपभ्रंश से ही नव्य भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ । संस्कृत की तरह अपभ्रंश का केवल एक ही भेद नहीं था । विभिन्न प्रान्तों में बोली जाने वाली अपभ्रंश भाषा का प्राकृत चन्द्रिका में सत्ताईस भेद गिनाया गया है :— व्राचड़ो लाटवैदर्भावुपनागरनागरी । बार्बरावान्त्य पांचाल टक्क मालव कैकयाः ॥ गौडोड्रैव पाश्चात्य पाण्ड्य कौन्तल सैंहलाः । कालिङ्ग प्राच्य कर्णाट काञ्चय द्राविड़ गौर्जराः ॥ आभीरो मध्य देशीयः सूक्ष्म भेद व्यवस्थितः । सप्त विंशत्यपभ्रंशाः येताल्लादिप्रभेदतः ॥ इन्हीं सत्ताईस प्रकारों के अपभ्रंशों में से एक अपभ्रंश जिसका नाम डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के मतानुसार सौराष्ट्रिय अपभ्रंश है, राजस्थान की ग्यारहवीं शती की भाषा थी । अपभ्रंश के उदाहरण हमें हेमचन्द्र आचार्य द्वारा रचित अपभ्रंश के व्याकरण तथा मेरुतुङ्गाचार्य कृत "प्रबन्ध चिन्तामणि" में अनेक मिलते हैं । नीचे इन दोनों ग्रंथों के दो-दो पद उदाहरण-स्वरूप इसलिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि इनकी भाषा की तुलना बीसलदेव रासो की भाषा से की जा सके ।


१. भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी, पृ० १०६-१०७ ।

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