बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
DevanagariHindipublished315 पृष्ठ
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- २७ - आदि कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके कारण इस तिथि को पूर्ण रूप से केवल दिन मिल जाने के कारण प्रामाणिक मानना उपयुक्त न होगा। अन्त में कहना पड़ेगा कि प्राप्य संवतों के आधार पर बीसलदेव रासो की रचना तिथि का निर्णय करना शंकाओं से निर्मुक्त नहीं हो सकता । प्राप्य प्रतियों में प्रति नं० २ ( १६६१ ) तथा ६ ( १७२४ ) ऐसी हैं जिनमें रचना तिथि प्रारम्भ में तथा अन्य प्रतियों में अन्त में दी गई है । इस आधार पर श्री अगरचन्द जी नाहटा ने यह तर्क उपस्थित किया है कि "ग्रन्थ के प्रारंभ में रचना काल का निर्देश करना मुसलमान ग्रन्थकारों की शैली है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में रचना-काल जहाँ दिया है वहाँ सदा ग्रन्थ के अन्त में ही दिया है प्रारम्भ में देने की पद्धति मुसलमानों की देखादेखी सोलहवीं शताब्दी के आस पास चली जान पड़ती है १।" लेकिन इस आधार पर यह कहना कि बीसलदेव रासो का रचयिता १६ वीं शताब्दी के लगभग का था, तर्करहित जान पड़ता है । रचना का समय ग्रन्थ के प्रारम्भ अथवा अन्त में देना रच- यिता की रुचि का प्रश्न है । प्राचीन ग्रंथों में जहाँ अनेक उदाहरण रचना तिथि को अन्त में देने के मिलते हैं वहाँ कई ग्रंथ ऐसे भी मिलते हैं जहाँ रचना तिथि प्रारम्भ में दी गई है। "जैन कवि" मान रचित "राजविलास" नामक ग्रन्थ में उसकी रचना का समय प्रारम्भ में ही स्तुतियों के बाद दिया गया है २।" ऐसे और भी अनेक उदाहरण प्राप्त हो सकते हैं । भाषा का दृष्टिकोण ग्रन्थों के रचना-काल पर भाषा की दृष्टि से भी विचार किया जाता है । श्री अगरचन्द जी नाहटा ने इस दृष्टिकोण से विचार करते हुए लिखा है कि "बीसलदेव रासो" की भाषा सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी की राजस्थानी भाषा है । जिन विद्वानों ने ग्यारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक की राजस्थानी भाषा का अध्ययन किया है, उनका यह मत हुए बिना नहीं रह सकता । ग्रंथ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम-नहीं के बराबर है। ३ और इस प्रसंग में पाद टिप्पणी देते हुए वे लिखते हैं कि "सोलहवीं शताब्दी में नरपति नाम का एक कवि हुआ भी है जिसका उल्लेख "जैन गुर्जर कवियों" भाग १ में है ४ । १. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० १६ ( पाद टिप्पणी ) २ नागरी प्रचारिणी पत्रिका-स० १६६७, पृ० १७१ ३. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० २१ ४. " " " " ( पाद टिप्पणी )