बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- २६ -
१२१२ के पक्ष का समर्थन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डा० श्यामसुन्दर दास (इन्होंने इस सम्बन्ध में अपने उपर्युक्त विचार को पीछे से बदल दिया था और सं० १२१२ का समर्थन करने लगे थे)¹ तथा सत्यजीवन वर्मा करते हैं। मिश्रबन्धुओं का अपना एक पृथक् वर्ग है, जो इसका अर्थ सं० १३५४ वि० लेता है। डा० रामकुमार वर्मा ने १०७३ को इसका निर्माण-काल माना। डा० माताप्रसाद गुप्त किसी तिथि का समर्थन नहीं करते। किसी भी कवि की कृति के निर्माण काल का निर्णय दो ही प्रकारों से हो सकता है। प्रथम और पुष्ट आधार तो है, उसकी कृति में दिया हुआ काल, जिसे अन्तःसाक्ष्य कहा जाता है, द्वितीय आधार है बाह्य साक्ष्य जिसमें कवि द्वारा वर्णित विषयवस्तु यदि रचना ऐतिहासिक हुई तो तथा भाषा आदि हस्त- लिखित प्रस्तुत कृति में हमें दोनों आधार प्राप्य हैं। अन्तः साक्ष्य का आधार प्राप्य प्रतियाँ हैं जिसमें हमें निम्न तिथियाँ निर्माण काल की प्राप्त होती हैं— 'अ' समूह : १. संवत सहस सतिहत्तरइ जाणि। रोहिणी नक्षत्र सोहामण्ड ॥ सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास। २. बारह सै बहोत्तरा हो मझारि। जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ ३ संवत सहंस तिहत्तरइ। सुकल पक्ष पंचमइ श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोहामणो॥ 'आ' समूह : ४. श्रावण शुक्ल ५ रो० 'क' समूह : ५ १०७३ 'ख' समूह : ६. संवत तेर सतोत्तरै जाणि। सुक पंचमी गइ श्रावण मास। हस्त नक्षत्र रविवार सु। उपर्युक्त अन्वय का अर्थ यह निकला कि 'अ' समूह की चार प्रतियों में हमें चार तिथियाँ मिलती हैं, १- १०७३, २- १२७२, ३- १०७३ तथा १—वीरकाव्य, पृ० १८६ ।