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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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के आधार पर कार्त्तिकादि वि० सं० १२०२ (चैत्रादि १२०१) ही को इसका रचनाकाल मानना पड़ता है ।¹ डा० उदयनारायण तिवारी को भी यही तिथि मान्य है ।² डा० माताप्रसाद गुप्त कहते हैं कि प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों के चार पाठों के आधार पर कम से कम छह तिथियाँ निकलती ही हैं :- १-स० १०७७-समूह 'क' २-स० १०७३-समूह 'ख' । ३-,, १२७७-समूह 'घ' ४-स० १२०७-समूह 'घ' । ५-,, १२०२-समूह 'स' ६-स० १२१२-समूह स० । चैत्रादि और कार्त्तिकादि-दो प्रकार के वर्षों के अनुसार इन छ की बारह तिथियाँ बन जाती हैं, और यदि गत और वर्तमान संवत् लिये जायें तो उपर्युक्त से कुछ २४ तिथियाँ होती हैं । यदि और आगे अमान्त और पूर्णिमान्त मासों के भेदों पर न भी आए, तो ये चौबीस तिथियाँ क्या कम हैं ? गणना करने पर इन चौबीस में कोई न कोई ठीक निकल ही आयेगी । गणना करके महामहोपाध्याय स्वर्गीय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने स० १२०१ की तिथि को कार्त्तिकादि वर्ष में होने पर गणना से ठीक बताया था ! किंतु असंभव नहीं है कि उपर्युक्त चौबीस तिथियों की गणना करने पर दो एक और भी ठीक निकल आवें । फिर १२३२ का पाठ स० समूह का है जो, पाठ की दृष्टि से यद्यपि समिश्रित है, किन्तु अत्यधिक प्रक्षेपपूर्ण है । वस्तुत यही समूह सबसे अधिक प्रक्षेपपूर्ण है । ऐसी दशा में इन पाठों के आधार पर ग्रन्थ की रचना तिथि निर्धारित करना उचित नहीं जान पड़ता ।³ बीसलदेव रासो के निर्माणकाल की उपर्युक्त आलोचना से निष्कर्ष यह निकलता है कि डा० गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा, श्री अगरचन्द नाहटा तथा डा० रामकुमार वर्मा को छोड़कर किसी अन्य विद्वान् ने "बारहसै बहोत्तरा" के अतिरिक्त अन्य तिथियों पर विचार नहीं किया । इस शब्द के अर्थ भी दो लगाये गये । एक अर्थ १२०२ लगाया गया तथा दूसरा अर्थ १२१२ । पहले अर्थ को मानने के पक्ष में श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, श्री अगर चन्द जी नाहटा, लाला सीताराम, तथा डा० उदयनारायण तिवारी हैं । १-नागरी प्रचारिणी पत्रिका-सं० १६६७, अंक २, पृ० १६३ १६५ । २-वीर काव्य-पृ० १६१ । ३-बीसलदेव रास पृ० ५१-५२ ।