बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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अधिक समीप है । यदि रासो की एक प्रति हमें यही संवत् देती है और इतिहास बीसल देव के समय को भी लगभग यही मानता है तो हमें बीसलदेव रासो की रचना १०७३ मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।' श्री सत्यजीवन वर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के उपर्युक्त मत को मानते हुए कहते हैं कि नरपति नाल्ह का दिया हुआ बीसलदेव रासो का संवत् १२१२ माननीय है ।^२ मिश्र बन्धुओं ने 'बहत्तोरोत्रा' का अर्थ 'बीस' माना है । आप लोग लिखते हैं कि 'नरपति नाल्ह ने इसका समय १२२० लिखा है । पर जो तिथि उन्होंने बुधवार को ग्रन्थ निर्माण की लिखी है वह १२२० संवत् में बुधवार को नहीं पड़ती । परन्तु १२२० शाके बुधवार को पड़ती है । इससे सिद्ध होता है कि रासो १२२० साके में बना, जिसका वि० सं० १३५७ है ।'^३ श्री अगरचन्द जी नाहटा ने विभिन्न प्राप्त प्रतियों के अनुसार रासो की रचना का संवत् १००३, १०७३, १२१२, १२०२, १२०३, १३०७, तथा १३०७ निकाला । लेकिन इन सभी संवतों में से उन्होंने सं० १२०२ को ( बारह सै बहत्तोरोत्तरा का अर्थ नाहटा जी ने १२०२ लिया है, १२१२ नहीं ) ही ठीक माना है क्योंकि जंत्रो के अनुसार इसकी तिथि नक्षत्र आदि मिल जाते हैं ।'^४ प्रसिद्ध विद्वान् डा० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने नाहटा जी द्वारा उपस्थित की हुई सारी तिथियों की जाँच करते हुए 'बारह सै बहत्तरां हा मझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ।' को ही ठीक माना है । इसके पक्ष में अपना तर्क देते हुए वे कहते हैं कि 'राजपूताने में पहले विक्रम संवत् कही चैत्रादि ( चैत्र शु० १ से आरम्भ होने वाला ) और कहीं कार्त्तिकादि ( कार्त्तिक शु० १ से आरम्भ होने वाला ) चलता था । जैसा कि वहाँ से मिलने वाले शिला लेखों, दान पत्रों और पुस्तकों से पाया जाता है । चैत्रादि वि० सं० १२०२ ज्येष्ठ व० ९ को शुक्रवार था और कार्त्तिकादि वि० सं० के अनुसार ( अर्थात् चैत्रादि १२०३ ) उक्त तिथि का बुधवार आता है । ऐसी दशा में हस्तलिखित प्रतियों
१- हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- पृ० २०८-२१० । २- बीसलदेवरास भूमिका पृ० ५-६ । ३-मिश्रबन्धु विनोद-भाग १, पृ० २०६ । ४-राजस्थानी- त्रैमासिक पत्रिका, भाग ३, पृ० २१ ।