बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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के आधार पर कार्त्तिकादि वि० सं० १२०२ (चैत्रादि १२०१) ही को इसका रचनाकाल मानना पड़ता है ।¹ डा० उदयनारायण तिवारी को भी यही तिथि मान्य है ।² डा० माताप्रसाद गुप्त कहते हैं कि प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों के चार पाठों के आधार पर कम से कम छह तिथियाँ निकलती ही हैं :- १-स० १०७७-समूह 'क' २-स० १०७३-समूह 'ख' । ३-,, १२७७-समूह 'घ' ४-स० १२०७-समूह 'घ' । ५-,, १२०२-समूह 'स' ६-स० १२१२-समूह स० । चैत्रादि और कार्त्तिकादि-दो प्रकार के वर्षों के अनुसार इन छ की बारह तिथियाँ बन जाती हैं, और यदि गत और वर्तमान संवत् लिये जायें तो उपर्युक्त से कुछ २४ तिथियाँ होती हैं । यदि और आगे अमान्त और पूर्णिमान्त मासों के भेदों पर न भी आए, तो ये चौबीस तिथियाँ क्या कम हैं ? गणना करने पर इन चौबीस में कोई न कोई ठीक निकल ही आयेगी । गणना करके महामहोपाध्याय स्वर्गीय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने स० १२०१ की तिथि को कार्त्तिकादि वर्ष में होने पर गणना से ठीक बताया था ! किंतु असंभव नहीं है कि उपर्युक्त चौबीस तिथियों की गणना करने पर दो एक और भी ठीक निकल आवें । फिर १२३२ का पाठ स० समूह का है जो, पाठ की दृष्टि से यद्यपि समिश्रित है, किन्तु अत्यधिक प्रक्षेपपूर्ण है । वस्तुत यही समूह सबसे अधिक प्रक्षेपपूर्ण है । ऐसी दशा में इन पाठों के आधार पर ग्रन्थ की रचना तिथि निर्धारित करना उचित नहीं जान पड़ता ।³ बीसलदेव रासो के निर्माणकाल की उपर्युक्त आलोचना से निष्कर्ष यह निकलता है कि डा० गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा, श्री अगरचन्द नाहटा तथा डा० रामकुमार वर्मा को छोड़कर किसी अन्य विद्वान् ने "बारहसै बहोत्तरा" के अतिरिक्त अन्य तिथियों पर विचार नहीं किया । इस शब्द के अर्थ भी दो लगाये गये । एक अर्थ १२०२ लगाया गया तथा दूसरा अर्थ १२१२ । पहले अर्थ को मानने के पक्ष में श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, श्री अगर चन्द जी नाहटा, लाला सीताराम, तथा डा० उदयनारायण तिवारी हैं । १-नागरी प्रचारिणी पत्रिका-सं० १६६७, अंक २, पृ० १६३ १६५ । २-वीर काव्य-पृ० १६१ । ३-बीसलदेव रास पृ० ५१-५२ ।
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१२१२ के पक्ष का समर्थन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डा० श्यामसुन्दर दास (इन्होंने इस सम्बन्ध में अपने उपर्युक्त विचार को पीछे से बदल दिया था और सं० १२१२ का समर्थन करने लगे थे)¹ तथा सत्यजीवन वर्मा करते हैं। मिश्रबन्धुओं का अपना एक पृथक् वर्ग है, जो इसका अर्थ सं० १३५४ वि० लेता है। डा० रामकुमार वर्मा ने १०७३ को इसका निर्माण-काल माना। डा० माताप्रसाद गुप्त किसी तिथि का समर्थन नहीं करते। किसी भी कवि की कृति के निर्माण काल का निर्णय दो ही प्रकारों से हो सकता है। प्रथम और पुष्ट आधार तो है, उसकी कृति में दिया हुआ काल, जिसे अन्तःसाक्ष्य कहा जाता है, द्वितीय आधार है बाह्य साक्ष्य जिसमें कवि द्वारा वर्णित विषयवस्तु यदि रचना ऐतिहासिक हुई तो तथा भाषा आदि हस्त- लिखित प्रस्तुत कृति में हमें दोनों आधार प्राप्य हैं। अन्तः साक्ष्य का आधार प्राप्य प्रतियाँ हैं जिसमें हमें निम्न तिथियाँ निर्माण काल की प्राप्त होती हैं— 'अ' समूह : १. संवत सहस सतिहत्तरइ जाणि। रोहिणी नक्षत्र सोहामण्ड ॥ सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास। २. बारह सै बहोत्तरा हो मझारि। जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ ३ संवत सहंस तिहत्तरइ। सुकल पक्ष पंचमइ श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोहामणो॥ 'आ' समूह : ४. श्रावण शुक्ल ५ रो० 'क' समूह : ५ १०७३ 'ख' समूह : ६. संवत तेर सतोत्तरै जाणि। सुक पंचमी गइ श्रावण मास। हस्त नक्षत्र रविवार सु। उपर्युक्त अन्वय का अर्थ यह निकला कि 'अ' समूह की चार प्रतियों में हमें चार तिथियाँ मिलती हैं, १- १०७३, २- १२७२, ३- १०७३ तथा १—वीरकाव्य, पृ० १८६ ।
- २४ - ४-१३०७ । 'घा' समूह की ६ प्रतियों में से चार प्रतियों में १०७७, एक में १२७२, दो में १००३, एक में १००३ जो कि भूल से लिखा प्रतीत होता है, तथा एक में सम्वत् नहीं मिलता है। 'क' समूह की प्रति में १००३ का उल्लेख है। 'ख' समूह की चौदह प्रतियों में से एक में १०७७, छः में १०७३ तथा दो में १३०७ के अतिरिक्त अन्य प्रतियों में रचनातिथि नहीं मिलती। इन संवतों में से १०७७ तथा १००३ को छोड़कर अन्य दो संवतों, १२७२ तथा १३०७ के दो अर्थ लगाये जाते हैं। १२०२ से १२१२ का भी अर्थ लगाया जाता है और इसी प्रकार १३०७ का अर्थ १२०७ भी विद्वान् लगाते हैं। विक्रमी संवतों के दो प्रकार के व्यवहार¹ (चैत्रादि और कार्तिकादि) उपयुक्त संवतों की बारह तिथियाँ देते हैं। लेकिन जिस प्रान्त की यह कथा है वहाँ प्रायः संवत् कार्तिक सुदी प्रतिपदा से आरम्भ होता है। एलेग्जेन्डर कनिंघम साहब कहते हैं— "The Vikrama Sambat, or era of Vikramaditya, is reconed from the vernal equinox of the year 57 B. C. and the comple- tion of the Kaliyuga year 3044. It is used all over northern India except in Bengal where the Saka era has been generally adopted. It is used also in Telingana and Gujrat, but in the latter province the year does not begin untill seven months later than in the north or with the first of Kartik Sudi. कनिंघम साहब के मत की पुष्टि प० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा भी एक प्रकार से करते हुए कहते हैं कि राजपूताने में पहले विक्रम संवत् कहीं चैत्रादि (चैत्र सु० १ से आरम्भ होने वाला) और कहीं कार्तिकादि (कार्तिक सु० १ से आरम्भ होने वाला) चलता था, जैसा कि वहाँ से मिलने वाले शिला लेखों, दान पत्रों और पुस्तकों से पाया जाता है।² चूँकि पं० गौरी- शंकर हीराचन्द जी ओझा के मतानुसार राजपूताने में कहीं चैत्रादि और कहीं कार्तिकादि संवत् प्रारम्भ होता है इसलिए बीसलदेव रासो की प्राप्य प्रतियों [ के छः संवतों के १२ संवतों का (चैत्रादि और कार्तिकादि के हिसाब से) तथा कनिंघम साहब के मतानुसार केवल छः संवतों की तिथि, वार आदि की गणना १—Book of Indian bras—Alexender cunningham—P. 47. २—ना० प्र० प०, स० १६६७, अंक २, पृ ० १६३ ।
-३२५ - की कसौटी पर कस कर देखना होगा कि प्राप्य संवतों में से किस संवत् को तिथि, वार आदि गणना की कसौटी पर खरे उतरते हैं । प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों में, प्राचीनतम संवत् हमें १०७७ मिलता है संवत् १६६३ की प्राप्य प्रति में, जो अबतक की प्राप्य प्रतियों में सबसे प्राचीन है, भी यही संवत् दिया हुआ है । इस संवत् के साथ तिथि श्रावण सुदि ५ तथा नक्षत्र रोहिणी दिया हुआ है । वार इसमें नहीं है । चैत्रादि संवत् के अनुसार वि० सं० १०७७ श्रावण शुक्ला ५ को गुरुवार और हस्त नक्षत्र था और कार्त्ति- कादि संवत् के अनुसार उक्त तिथि को सोमवार और हस्त नक्षत्र आता है ।¹ यदि दिन के उल्लेख के अभाव के कारण किसी प्रकार इस संवत् को ग्रंथ का रचना-काल मान भी लिया जाय तो नक्षत्र की विभिन्नता इस संवत् को मानने में बाधा उपस्थित करती है । दूसरा प्राप्य संवत् १००३ है । इस संवत् के साथ मास, पक्ष, तिथि, वार आदि कुछ नहीं है, इसलिए इस सम्बन्ध में कोई जाँच सम्भव नहीं । इसके पश्चात् विचारणीय संवत् १२७२ है जिसका दूसरा अर्थ १२१२ भी लगाया गया इस संवत् के साथ तिथि तथा वार का उल्लेख है, नक्षत्र का नहीं । पं० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा का मत है कि चैत्रादि विक्रम संवत् १२७२ ज्येष्ठ बदी शुक्रवार था तथा कार्त्तिकादि वि० सं० के अनु- सार अर्थात् चैत्रादि १२७३ में उक्त तिथि को गुरुवार आता है । दिन मिल जाने के कारण ओझाजी ने इसी संवत् को ग्रंथ की रचना-तिथि माना है² । इस संवत् के दूसरे अर्थ का अर्थात् १२१२ का समर्थन आचार्य रामचन्द्र जी शुक्ल तथा श्री सत्यजीवन जी वर्मा करते हैं । इन लोगों के मतानुसार गणना करने पर विक्रम सं० १२१२ में ज्येष्ठ बदी ६ को ही बुधवार पड़ता है ।³ श्री सत्यजीवन जी वर्मा का तो यहाँ तक कहना है कि "सं० १२७२ में जेठ बदी नवमी बुधवार को नहीं पड़ती ।⁴ इस संवत् के सम्बन्ध में उपर्युक्त विद्वानों के दो विपरीत मतों ने एक विषम समस्या उपस्थित कर दी है । सं० १२१२ में भी जेठ बदी ६ को बुधवार का पड़ना और १२७२ में भी उसी तिथि को बुधवार का पड़ना, एक ऐसी समस्या है जिस पर विचार करना आवश्यक है । खेद है 1 Indian Ephemaris, vol III, PP 43, 45 २. ना० प्र० प०, १९६७, अंक २, पृ० १६३ । ३. हिन्दी साहित्य का इतिहास सं० २००३, पृ० २४ । ४. बीसलदेव रासो—पृ० ५ भूमिका ।
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कि उपर्युक्त विद्वानों में से किसी ने यह बताने का कष्ट नहीं दिया कि किस आधार पर उन लोगों ने गणना की। इण्डियन एफीमेरीज के विद्वान् लेखक ने गणना कर विभिन्न संवतों के जो दिन और नक्षत्र आदि दिये हैं उसके अनुसार चैत्रादि के १२०२ की जेठ बदी ६ को शुक्रवार "शतभिषक्" नक्षत्र पड़ता है तथा कार्त्तिकादि से प्रारम्भ होने वाले इस संवत् की जेठ बदी ६ को शुक्रवार हस्त नक्षत्र पड़ता है।¹ इस संवत् के पाठ का जो दूसरा अर्थ १२१२ लगाया गया है उसके सम्बन्ध में भी उप- युक्त पुस्तक में जो उल्लेख प्राप्य है उसके अनुसार चैत्रादि जेठ बदी ६ को बृहस्पतिवार और रेवती नक्षत्र तथा कार्त्तिकादि जेठ बदी ६ को बुधवार और हस्त नक्षत्र था²। इस गणना की दृष्टि से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और श्री सत्यजीवन वर्मा का यह मत कि संवत् १२१२ में जेठ बदी ६ को बुधवार पड़ता है, ठीक है। इन संवतों के अतिरिक्त एक संवत् १३७७ भी प्राप्य है। इस संवत् के साथ तिथि, वार तथा नक्षत्र सभी दिया हुआ है। अतः गणना करने में बड़ी सुविधा है। गणना करने पर चैत्रादि संवत् के अनुसार विक्रम संवत् १३७७ श्रावण सुदी ५ को रेवती नक्षत्र और शनिवार था तथा कार्त्तिकादि संवत् के अनुसार उक्त तिथि को अश्विनी नक्षत्र और बृहस्पतिवार आता है³। इस तरह यह संवत् भी अशुद्ध ठहरता है। इस संवत् का दूसरा अर्थ १३०७ भी लगाया गया है। गणना करने पर चैत्रादि संवत् १३०७ श्रावण शुक्ल ५ को बुधवार तथा "ह० भाद" पड़ता है एवं कार्त्तिकादि संवत् १३०७ "अर्थात् चैत्रादि १३०८" श्रावण शुक्ल ५ को मंगलवार और अश्विनी नक्षत्र पड़ता है⁴। उपर्युक्त प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों में उल्लेख किये गये विभिन्न संवतों की गणना का निष्कर्ष यह निकला कि संवत् १२०२ के पाठ का अर्थ १२१२ निकालने पर और कार्त्तिकादि से इस संवत् का प्रारम्भ मानने पर जेठ बदी ६ को बुधवार पड़ता है जो कि संवत् १६६३ वाली प्रति में दिये गये पाठ का लगाया गया अर्थ है; लेकिन इसे मानने में इस संवत् के साथ नक्षत्र के उल्लेख का अभाव तथा इस प्रति के चार खण्डों में विभाजित होने के कारण इसके प्रामाणिक होने में सन्देह तथा बारह से बहोत्तरा का लगाया गया अर्थ १२१२,
1 Indian Ephemaries vol IV, P. P 32, 34 2 ,, ,, vol III, P P 312, 314. 3 ,, ,, vol IV, P. P. 243, 245 4. ,, ,, vol IV, P. P. 103, 105.
- २७ - आदि कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके कारण इस तिथि को पूर्ण रूप से केवल दिन मिल जाने के कारण प्रामाणिक मानना उपयुक्त न होगा। अन्त में कहना पड़ेगा कि प्राप्य संवतों के आधार पर बीसलदेव रासो की रचना तिथि का निर्णय करना शंकाओं से निर्मुक्त नहीं हो सकता । प्राप्य प्रतियों में प्रति नं० २ ( १६६१ ) तथा ६ ( १७२४ ) ऐसी हैं जिनमें रचना तिथि प्रारम्भ में तथा अन्य प्रतियों में अन्त में दी गई है । इस आधार पर श्री अगरचन्द जी नाहटा ने यह तर्क उपस्थित किया है कि "ग्रन्थ के प्रारंभ में रचना काल का निर्देश करना मुसलमान ग्रन्थकारों की शैली है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में रचना-काल जहाँ दिया है वहाँ सदा ग्रन्थ के अन्त में ही दिया है प्रारम्भ में देने की पद्धति मुसलमानों की देखादेखी सोलहवीं शताब्दी के आस पास चली जान पड़ती है १।" लेकिन इस आधार पर यह कहना कि बीसलदेव रासो का रचयिता १६ वीं शताब्दी के लगभग का था, तर्करहित जान पड़ता है । रचना का समय ग्रन्थ के प्रारम्भ अथवा अन्त में देना रच- यिता की रुचि का प्रश्न है । प्राचीन ग्रंथों में जहाँ अनेक उदाहरण रचना तिथि को अन्त में देने के मिलते हैं वहाँ कई ग्रंथ ऐसे भी मिलते हैं जहाँ रचना तिथि प्रारम्भ में दी गई है। "जैन कवि" मान रचित "राजविलास" नामक ग्रन्थ में उसकी रचना का समय प्रारम्भ में ही स्तुतियों के बाद दिया गया है २।" ऐसे और भी अनेक उदाहरण प्राप्त हो सकते हैं । भाषा का दृष्टिकोण ग्रन्थों के रचना-काल पर भाषा की दृष्टि से भी विचार किया जाता है । श्री अगरचन्द जी नाहटा ने इस दृष्टिकोण से विचार करते हुए लिखा है कि "बीसलदेव रासो" की भाषा सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी की राजस्थानी भाषा है । जिन विद्वानों ने ग्यारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक की राजस्थानी भाषा का अध्ययन किया है, उनका यह मत हुए बिना नहीं रह सकता । ग्रंथ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम-नहीं के बराबर है। ३ और इस प्रसंग में पाद टिप्पणी देते हुए वे लिखते हैं कि "सोलहवीं शताब्दी में नरपति नाम का एक कवि हुआ भी है जिसका उल्लेख "जैन गुर्जर कवियों" भाग १ में है ४ । १. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० १६ ( पाद टिप्पणी ) २ नागरी प्रचारिणी पत्रिका-स० १६६७, पृ० १७१ ३. राजस्थानी-भाग ३, अंक ३, पृ० २१ ४. " " " " ( पाद टिप्पणी )
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इन्हीं आधारों पर ये शायद कहना चाहते हैं कि यह रचना १६ वीं शताब्दी की है और उसका रचयिता भी १६ वीं शताब्दी का है। लेकिन जिन प्रतियों की भाषा के आधार पर श्री नाहटाजी ने यह परिणाम निकाला है उन प्रतियों में ग्रंथ की अन्तिम स्थितियों तक की भाषा का मिश्रण हुआ है। फिर उनका यह कहना कि ग्रन्थ में प्राचीन भाषा का अंश बहुत कम नहीं के बराबर है" स्वयं यह सिद्ध करता है कि ग्रन्थ की भाषा में प्राचीन के कुछ उदाहरण प्राप्त हैं। उत्तरोत्तर उसमें अनेक प्रकार की बोलियों का मिश्रण शताब्दियों के व्यतीत होने के साथ-साथ होता गया। हमें सत्रहवीं शताब्दी की प्राचीनतम प्रति प्राप्त है। यदि ग्रन्थ का रचना-काल दी गयी रचनातिथि के अनुसार ११ वीं या १२ वीं शती मान लिया जाय तब भी प्राप्त प्रतियाँ तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् की रचित हैं। अतः तीन या चार सौ वर्षों के पश्चात् उस काल की भाषा का जिस काल में यह ग्रन्थ मूल रूप से रचित हुआ था, प्राप्त होना असम्भव है। प्रसिद्ध विद्वान् पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी की भाषा के कुछ उदाहरणों को देते हुए कहा है कि "भाषा का प्रयोग कवि की रुचि पर निर्भर है। जैनों के धर्मग्रन्थ (सूत्र) प्राकृत (अर्ध मागधी) भाषा में होने के कारण जैन लेखक अपने भाष्य काव्यों में प्राकृत शब्दों की भरमार करते रहे हैं, जिससे उनकी भाषा दुरूह हो गयी है। चारण, भाट आदि प्राकृत से अधिक परिचित न होने के कारण अपनी रचनाएं प्रचलित भाषा में करते थे, जिससे इन दोनों प्रकार के लेखकों की पुस्तकों की भाषा में अन्तर होना स्वाभाविक ही है। भाषा की कसौटी सदियाँ नहीं हैं। एक ही समय में कोई सरल भाषा में अपनी रचना करता है तो कोई कठिन भाषा का प्रयोग करता है।' डा० उदयनारायण तिवारी भी पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की बातों को पुष्ट करते हुए लिखते हैं कि "भाषा के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है कि क्या इसकी भाषा उस समय की साहित्यिक भाषा है या सर्व- साधारण के बोलचाल की भाषा ? अथवा सम्भव है कि वह उन दोनों में से एक भी न हो। इस सम्बन्ध में इस बात को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जैन लेखक तथा कवि प्राकृत (अर्द्ध मागधी प्राकृत तथा अपभ्रंश) का ही प्रयोग
१. ना० प्र० प०—सं० १६६७, पृ० १०१ ।
- २९ - अपनी कविताओं में करते थे : किन्तु साधारण चारण और कवि प्राकृत से अपरि- चित होने के कारण अपनी प्रचलित भाषा में ही रचना करते थे। नरपति नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न तो कोई सुकवि। अतएव उसके लिए अपनी मातृभाषा राजस्थानी में कविता करना सर्वथा स्वाभाविक था।१ कारकों के वियोगा तथा संयोगा अवस्थाओं के रूप, क्रियाओं के सहायक क्रिया से बने हुए तथा संस्कृत की ही भाँति मूल क्रिया में प्रत्यय जोड़ कर बने हुए रूप, राजस्थानी उच्चारण के अनुसार 'न' के स्थान पर "ण" का प्रयोग तथा संज्ञा शब्दों के अन्त में "दा", "दी" और "दे" आदि के प्रयोगों के उदा- हरणों को दिखाकर डा० उदयनारायण जी तिवारी ने यह सिद्ध किया है कि इसकी भाषा १२००—१३०० वि० संवत् की है।२ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह मत है कि यद्यपि गाने की चीज़ होने के कारण मूल रासो की भाषा में समयानुसार बहुत कुछ फेर-फार होता रहा है किन्तु लिखित रूप में रक्षित होने के कारण इसका पुराना ढाँचा बहुत कुछ बचा हुआ है। अपने इस कथन की पुष्टि करने के लिये वे रासो में प्रयुक्त कुछ शब्दों की ओर संकेत करते हैं, जैसे 'चित्तह' = चित्त में, "रणि" = रण में, "ईणी विधि" = इस प्रकार, "ईसउ" = ऐसा, "नेयर" = नगर, "पसाउ" = प्रसाद, "पयोधर" = पयोधर, इत्यादि ।३ विविध विद्वानों के भाषा-सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह ज्ञात होता है कि ग्रन्थ की भाषा प्राचीन है और वह सं० ग्यारहवीं तथा बारहवीं के लगभग की हो सकती है। सोलहवीं शताब्दी की तो कदापि नहीं जैसा कि श्री नाहटा जी ने कहा है; क्योंकि पृथ्वीराज रासो तथा बीसलदेव रासो की भाषा के तुल- नात्मक अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि बीसलदेव रासो की भाषा पृथ्वीराज रासो की भाषा से पुरानी है। उपर्युक्त भाषा सम्बन्धी विविध विद्वानों के प्रकाशित मतों से यह निष्कर्ष निकलता है कि रासो की भाषा ग्यारहवीं तथा बारहवीं शती के लगभग की हो सकती है। अब प्रश्न यह उठता है कि ग्यारहवीं और बारहवीं शती में भारत- वर्ष की भाषा कौन सी थी। डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या महोदय ने अलबेरूनी १. वीरकाव्य—पृ० २०० । २. वीरकाव्य—पृ० २००—२०३ । ३. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ४४।
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के भारत वर्णन का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक "भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी" में लिखा है कि लगभग १०२५ ई० में भारतीय आर्य भाषा दो रूपों में विभाजित थी, एक तो उपेक्षित ग्राम्य भाषा जिसका केवल साधारण जन में प्रचार था, और दूसरी शिष्ट, सुशिक्षित उच्च वर्ग में प्रचलित साहित्यिक भाषा, जिसे बहुत से लोग अध्ययन कर प्राप्त करते थे तथा जो व्याकरणात्मक विभक्ति, योग, व्युत्पत्ति, तथा व्याकरण के नियमों एवं अलंकार, रस शास्त्र की बारीकियों से बद्ध थी । इन दो रूपों के बावजूद भी वह भारतीय भाषा को एक ही गिनता है । सुसंस्कृत ब्राह्मण वर्ग संस्कृत की परम्परा को ही चलती रखता थी और उसके संरक्षक क्षत्रिय एवं अन्य नृपतिगण उसे आश्रय भी देते रहते...यद्यपि ये स्वयं तथा उनसे नीचे वर्ग की प्रजा अपभ्रंश तथा देशी भाषाओं मे ही अपना मनो- रञ्जन करते थे ।१ अलबेरूनी की उपर्युक्त उक्ति यह सिद्ध करती है कि ग्यारहवीं शती में भारत- वर्ष में संस्कृत तथा अपभ्रंश दो प्रकार की भाषाएँ प्रचलित थीं । कालान्तर में अपभ्रंश से ही नव्य भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ । संस्कृत की तरह अपभ्रंश का केवल एक ही भेद नहीं था । विभिन्न प्रान्तों में बोली जाने वाली अपभ्रंश भाषा का प्राकृत चन्द्रिका में सत्ताईस भेद गिनाया गया है :— व्राचड़ो लाटवैदर्भावुपनागरनागरी । बार्बरावान्त्य पांचाल टक्क मालव कैकयाः ॥ गौडोड्रैव पाश्चात्य पाण्ड्य कौन्तल सैंहलाः । कालिङ्ग प्राच्य कर्णाट काञ्चय द्राविड़ गौर्जराः ॥ आभीरो मध्य देशीयः सूक्ष्म भेद व्यवस्थितः । सप्त विंशत्यपभ्रंशाः येताल्लादिप्रभेदतः ॥ इन्हीं सत्ताईस प्रकारों के अपभ्रंशों में से एक अपभ्रंश जिसका नाम डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के मतानुसार सौराष्ट्रिय अपभ्रंश है, राजस्थान की ग्यारहवीं शती की भाषा थी । अपभ्रंश के उदाहरण हमें हेमचन्द्र आचार्य द्वारा रचित अपभ्रंश के व्याकरण तथा मेरुतुङ्गाचार्य कृत "प्रबन्ध चिन्तामणि" में अनेक मिलते हैं । नीचे इन दोनों ग्रंथों के दो-दो पद उदाहरण-स्वरूप इसलिए प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि इनकी भाषा की तुलना बीसलदेव रासो की भाषा से की जा सके ।
१. भारतीय आर्य भाषा और हिन्दी, पृ० १०६-१०७ ।
- ३१ - पुत्ते जाएँ कवणु गुणु अवगुणु कवणु मुएण । जा बप्पी की भुंहड़ी चंपिज्जइ अवरेण ॥ "अपभ्रंश व्याकरण, हेमचन्द्र आचार्य" जेवडु अंतरु रावण रामहं तेवडु अंतरु पट्णगामहं । "वही" जा मति पच्छइ संपज्जइ सामति पहिली होइ । मुंज भणइ मृणालवइ विघन न वेढइ कोइ । "प्रबन्ध चिन्तामणि" जइ यह रावणु जाइयउ दहमुहु इक्कु सरीरु । जणणि वियंभी चिंतवइ कवणु पियावडं खीरु ॥ "वही" उपर्युक्त उदाहरणों में : बीसलदेव रास में : संज्ञा संज्ञा पुत्तैँ, बप्पी, पट्टण घूमडा, सेजटी, मोजडी, रामहं, दह, मुंढ, इक्कु भाटणि, नयण, घहरणि, सरीरु, जणणि, खीरु पतउड, ग्रीपणउ, सुपिनउ, भुंहडी आदि । तनरु, आदि । क्रिया क्रिया भजइ, वेढइ, चिंतवइ, भयइ, गियइ, जडइ, पियावडं आदि । ओलावइ, आदि । संज्ञा और क्रिया के रूप जैसे "अपभ्रंश व्याकरण" और प्रबन्ध-चिन्तामणि में हैं वैसे ही बीसलदेव रासो में भी हैं । हेमचन्द्र आचार्य के व्याकरण का रचना- काल वि० संवत् १२०० के लगभग और प्रबन्ध चिन्तामणि का संवत् १३६१ है, लेकिन हेमचन्द्राचार्य के व्याकरण में उद्धृत की हुई पंक्तियाँ उदाहरण-स्वरूप आई हैं । अतः निश्चय ही ये पंक्तियाँ ग्रन्थ की रचना के पहले की हैं । इसी प्रकार "प्रबन्ध चिन्तामणि" की भाषा के लिए भी कहा जा सकता है कि जिस अपभ्रंश के व्याकरण का उल्लेख इसमें हुआ है वह इस ग्रंथ की रचना के बहुत पहले जन-साधारण की भाषा रही होगी और उसके पश्चात् ही "प्रबन्ध चिन्ता- मणि" के रचयिता ने उसी भाषा के संस्कृत रूप को अपने ग्रन्थ में स्थान दिया
- १२ - होगा । अस्तु, इसकी भाषा भी संवत् १२६१ से पहले की है, इसमें सन्देह नहीं । बीसलदेव रासो की भाषा जैसा कि ऊपर उदाहरणों द्वारा दर्शाया गया है "अपभ्रंश व्याकरण" और "प्रबन्ध चिन्तामणि" में उद्धृत उदाहरणों की भाषा से बहुत अंशों में मिलती जुलती है । भाषा के उपर्युक्त आधार पर निर्भर होकर ऐसा कहा जा सकता है कि बीसलदेव की रचना ग्यारहवीं शताब्दी के उत्त- रार्द्ध और १२ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुई होगी। लेकिन भाषा के आधार पर उपर्युक्त निर्णय करने में डा० उदयनारायण जी तिवारी द्वारा निकाला गया यह निष्कर्ष कि चूँकि नाल्ह न तो भाषा का पण्डित था और न कोई सुकवि, अतएव उसने अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में बीसलदेव रासो की रचना की, बाधा उपस्थित करता है, यद्यपि डा० तिवारी का यहाँ "राजस्थानी" कहना अस्पष्ट है, क्योंकि इसके द्वारा उनका संकेत किस ओर है, इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता । यदि डा० तिवारी का उद्देश्य 'राजस्थानी' से शौरसेनी अपभ्रंश से हो, तब तो उपर्युक्त निकाले गये निष्कर्ष से उनका मन्तव्य सिद्ध होता है, और यदि उनका अर्थ राजस्थानी से पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान की बोलियों से है तब यह विचार करना होगा कि ये बोलियाँ कब से राजस्थान में प्रचलित हुईं । इन बोलियों के सम्बन्ध में डा० सुनीतिकुमार जी चाटुर्ज्या का कहना है कि पुरानी पश्चिमी राजस्थानी साहित्य 'अर्थात् पुरानी मारवाड़ी, गुजराती साहित्य' का इतिहास ई० चौदहवीं सदी के द्वितीयार्द्ध से शुरू हुआ, मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से, 'जो शौरसेनी से निकट सम्बद्ध होती हुई भी उसे स्वतन्त्र अपभ्रंश थी ऐसा अनुमित होता है-इसे हम "सौराष्ट्र अपभ्रंश" कह सकते हैं । पुरानी पश्चिमी राजस्थानी का उद्भव, तेस्सीतोरी के मतानुसार, ईस्वी तेरहवीं शती में हुआ था । गुजरात और मारवाड़ के जैन आचार्य और पण्डितों के द्वारा सौराष्ट्र अपभ्रंश से उद्भूत पुरानी राजस्थानी में साहित्य सर्जना होने लगी, पर साथ ही साथ शौरसेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा में पूर्ववत् काव्यादि साहित्यिक रचना की नीति अन्वाहित रही । फिर, यह शौर- सेनी अपभ्रंश साहित्यिक भाषा, पूर्व से बढ़ती गयी, इसका एक नवीन या अर्वाचीन रूप, पिंगल नाम से, राजस्थान और मालव के कवियों में पूर्णतया गृहीत हुई, पिंगल का एक साहित्य बन गया। फिर राजपूताने के भाट और चारणों ने पिंगल की अनुकारी एक नई कवि भाषा मारवाड़ी के आधार पर बनाई, जो "डांगल" या 'डिंगल' नाम से अब परिचित है। डिंगल काव्य ईस्वी पन्द्रहवीं शती से उपलब्ध है। ज्यादातर इसकी शब्दावली साहित्यिक थी,
३ - ३३ - अर्थात् प्रचलित मौखिक मारवाड़ी की शब्दावली से पृथक् होती थी ।१ प्रसिद्ध विद्वान् तेस्सीतोरी और डा० चाटुर्ज्या का उपर्युक्त मत यह सिद्ध करता है कि मारवाड़ और गुजरात में प्रचलित मौखिक अपभ्रंश से राजस्थानी का उदय तेरहवीं शती में हुआ था । अर्थात् इसके पहले वहाँ की बोलचाल की भाषा अपभ्रंश थी । तथा अपभ्रंश के बाद "पिंगल" और तब डिंगल का स्थान आता है । आज के प्राप्त इस ग्रंथ की प्रतियों में निस्सन्देह डिंगल और पिंगल भाषा की बहुलता है, क्योंकि १५ वीं शती के पश्चात् की ही ये सभी प्रतियाँ हैं लेकिन इन प्रतियों में अपभ्रंश संज्ञाओं और क्रियाओं का प्रयोग तो स्पष्ट सिद्ध करता है कि इस काव्य की रचना अति प्राचीन अर्थात् १२ वीं शती की थी और स्मरण के आधार पर लिखित होने के कारण केवल थोड़े बहुत शब्दों और क्रियाओं का ही प्रयोग लेखबद्ध करते समय किया जा सका । तथा इस कथन में भी अत्युक्ति न होगी कि इस ग्रन्थ की रचना आजकल की राजस्थानी में नहीं हुई थी, जैसा कि डा० उदयनारायण जी तिवारी का विचार है, यदि उन्होंने सच- मुच राजस्थानी शब्द का प्रयोग आज की राजस्थानी के लिए किया हो । ऐतिहासिक दृष्टिकोण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना-तिथि पर विचार करते हुए डा० रामकुमार वर्मा ने सं० १००३ को इतिहास के निकट माना है और अपने मत की पुष्टि में इतिहास के प्रमाण दिये हैं ।२ ( लेकिन राजा भोज और बीसलदेव के समय को देते हुए भी वे यह कहना भूल गये कि किस बीसलदेव की चर्चा वे कर रहे हैं, क्योंकि इतिहास में बीसलदेव चार हो चुके हैं । ) श्री सत्यजीवन वर्मा ने सं० १२१२ को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ठीक सम- झते हुए कहा है कि "बीसलदेव" विग्रहराज चतुर्थ का दूसरा नाम है । बीसल- देव के शिलालेख सं० १२१० और १२२० के प्राप्त हैं । अजमेर बसने के पश्चात् केवल वही बीसलदेव हुआ है । यह अर्णोराज का पुत्र और जगदेव का छोटा भाई था । यह अपने बड़े भाई जगदेव के जीते जी उससे राज छीन कर गद्दी पर बैठा था । इसको विद्या से बड़ा प्रेम था । इसका रचा हुआ हर- केलिनाटक है । यह नाटक वि० सं० १२१० ( सन् ११५३ ) की माघ शुक्ला १. राजस्थानी भाषा...डा० सुनीति कुमार चाटुर्ज्या...पृ० ६५ । २. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २६८-१० ।
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पद्धती को समाप्त हुआ था। यह सन् ईसय् में खुदाई करने पर प्राप्त हुआ है। इसी स्थान में बीसलदेव द्वारा स्थापित पाठशाला थी। दिल्ली के प्रसिद्ध फीरोज शाह की लाट पर वि० स० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का इसका एक लेख भी है। इत्यादि ।¹ श्री सत्यजीवन जी वर्मा ने १६६१ की लिखी हुई प्रति के आधार पर ही अपना यह मत प्रकट किया है। उस प्रति में "बारह सै बहोत्तराहां मझारि" का ही उल्लेख है। जब यह प्रति श्री वर्मा जी द्वारा सम्पादित हुई थी तब तक वही प्राचीनतम प्रति मानी जाती थी। अतः श्री वर्माजी के लिये यह स्वाभाविक था कि वे इसमें दिये हुए रचना काल को ही ठीक मानें और उसकी पुष्टि में प्रमाण दें। लेकिन उनके लिए भी अच्छा यह होता कि वे अन्य प्रतियों की तिथियों पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार कर लेते और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अपना मूल्यवान विचार उपस्थित करते हुए प्राप्य तिथि की गणना भी कर लेते। डा० उदयनारायण जी तिवारी ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रचना तिथि पर विचार करते हुए कहा है कि यदि बीसलदेव को विग्रहराज चतुर्थ मान लिया जाय तो राजमती से उसके विवाह की कथा इतिहास के विरुद्ध ठहरती है। राजमती को बीसलदेव रासो में भोज की पुत्री कहा गया है और भोज का समय लगभग सं० १११२ के आस पास था। बीसलदेव चतुर्थ का समय सं० १२०७ से १२२० तक का माना गया है। इस प्रकार सौ वर्ष पूर्व के किसी व्यक्ति की पुत्री से विवाह होने की कथा बड़ी असङ्गत होगी।² इस आधार पर बीसलदेव रासो का नायक बीसलदेव चतुर्थ नहीं ठहरता। बीसलदेव तृतीय के पक्ष में बिजोलियाँ के शिलालेख का प्रमाण, जिसमें चौहानों की वंशावली दी गयी है तथा जिसमें विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया गया है, और अन्य शिलालेखों के प्रमाण, जिसके अनुसार भोज के भाई उदयादित्य का विग्रहराज तृतीय का समकालीन होना सिद्ध होता है, तथा भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से होने की सम्भावना सिद्ध होती है, डा० उदयनारायण जी तिवारी देते हैं।³ विग्रहराज तृतीय का समय डा० उदयनारायण जी तिवारी ने स० ११५० वि० माना है। और ग्रंथ
१. बीसलदेव रासो—पृ० ६-७। २. वीर काव्य—पृ० १६३। ३. वीर काव्य—पृ० १६४।
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की रचना तिथि सं० १२०२ वि० मानते हैं। (इस प्रकार लगभग १२५ वर्ष पश्चात् इस ग्रंथ की रचना के सम्बन्ध में उनका विचार है कि इस ग्रन्थ को छन्दोबद्ध करने वाले कवि नरपति नाल्ह को केवल इतना ही ज्ञात था कि किसी भोज की पुत्री राजमती के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ था। उसी के आधार पर उसने अनेक कल्पनात्मक नामों तथा घटनाओं का मिश्रण करके लोकरंजनार्थ एक काव्य गाने योग्य तैयार कर दिया । यह विवाह कब हुआ था, इसका उसको ठीक-ठीक पता न था, इसलिए राजमती के पिता के नाते, भोज के जीवन- काल में ही विवाह हो जाने का उसने वर्णन कर दिया है।¹ डा० माताप्रसाद गुप्त ने स्थूल रूप से ग्रंथ के रचना-काल के विषय में विचार करते हुए इसके ऐतिहासिक तथ्यों का विवेचन किया है। बीसलदेव तृतीय या चतुर्थ अजमेर की स्थापना, भोज द्वारा मगेवा, सोरठ, टॉक आदि कई प्रान्तों को बीसलदेव को दिये जाने की बात तथा बीसलदेव के उड़ीसा यात्रा की कथा का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हुए डा० गुप्त इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी था। उसी के सम्बन्ध में राजमती नाम से कुछ कहानियाँ समय पाकर प्रसिद्ध हो गई । फिर भोज परमार आदि से उसे सम्बन्धित कर विग्रहराज तृतीय के बहुत बाद किसी नरपति नाल्ह नामक कवि ने इस ग्रन्थ की रचना कर डाली ।² प० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ग्रन्थ के ऐतिहासिक तथ्यों का विशेष रूप से विश्लेषण किया है। वे कहते हैं कि "बीसलदेव रासो में कवि ने मुख्यतया दो घटनाओं का वर्णन किया है-एक तो बीसलदेव के राजाभोज की पुत्री से विवाह होने की और दूसरा उसके (बीसलदेव) उड़ीसा जाने की। जहाँ तक पहली घटना का सम्बन्ध है, बीज रूप में उसमें सत्य का अंश अवश्य है, परन्तु शेष कथा कल्पित ही प्रतीत होती है। अपने इस कथन की पुष्टि में उन्होंने कहा है कि 'बिजोल्यां के शिलालेख में दी हुई चौहानों की वंशावली में विग्रहराज तृतीय की रानी का नाम राजदेवी दिया है। बीसलदेव रासो की राजमती और यह राजदेवी नाम एक ही रानी के सूचक होने चाहिये ।" चौहान राजा बीसलदेव तृतीय से परमार वंशीय राजकुमारी राजदेवी राजा भोज की पुत्री के विवाह के सम्बन्ध में अपना अनुमान प्रकट करते हुए श्री ओझा कहते
१ वीर काव्य—पृ० १६४ । २. बीसलदेव रास—पृ० ५५ ।
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हैं कि राजा भोज के कनिष्ठ भ्राता उदयादित्य ने सम्भव है अपना पुराना वैर मिटाने के लिए अपनी भतीजी भोज की पुत्री राजदेवी अथवा राजमती का विवाह बीसलदेव तृतीय से किया हो; क्योंकि राजपूतों में आपस के वैर प्रायः पुत्री विवाहने से मिट जाते थे, जिसके अनेक उदाहरण उनके इतिहास में मिलते हैं'।" इसके अतिरिक्त डा० ओझा ने शिलालेखों का प्रमाण देते हुए यह सिद्ध किया है कि विग्रहराज बीसलदेव तृतीय परमार-राजा भोज के भाई उदयादित्य का समकालीन था, जो वि० सं० १११६ के आस पास गद्दी पर बैठा था।१ इन्हीं ऐतिहासिक सत्यों के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बीसल- देव रासो का नायक चौहान राजा—बीसलदेव तृतीय है और इसका रचना-काल कार्तिक वि० सं० १२०२ चैत्रादि १२०३ होना चाहिए। आचार्य रामचन्द्र जी शुक्ल कहते हैं कि "दिये हुए सं० के विचार से कवि अपने नायक का समसामयिक जान पड़ता है। पर वर्णित घटनाएँ, विचार करने पर बीसलदेव के बहुत पीछे की जान पड़ती हैं, जब कि उनके सम्बन्ध में कल्पना की गुंजाइश हुई होगी। यह घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है। इसमें दो ही घटनाएँ हैं—बीसलदेव का विवाह और उनका उड़ीसा जाना। इनमें से पहली बात तो कल्पना प्रसूत प्रतीत होती है। बीसलदेव से १०० वर्ष पहले ही धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज का देहान्त हो चुका था। अतः उनकी कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह किसी पीछे के कवि की कल्पना ही प्रतीत होती है। उस समय मालवा में भोज नाम का कोई राजा नहीं था। बीसल- देव की एक परमार वंश की रानी थी, यह बात परम्परा से अवश्य प्रसिद्ध चली आती थी, क्योंकि इसका उल्लेख पृथ्वीराजरासो में भी है। इसी बात को लेकर पुस्तक में भोज का नाम रखा हुआ जान पड़ता है। अथवा यह हो सकता है कि धार के परमारों की उपाधि ही भोज रही हो और उस आधार पर कवि ने केवल यह उपाधि-सूचक नाम ही दिया हो, असली नाम न दिया हो। कदाचित् इन्हीं में से किसी की कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ हो। परमार कन्या के सम्बन्ध में कई स्थानों पर जो वाक्य आये हैं, उन पर ध्यान देने से यह सिद्धान्त पुष्ट होता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से न १. नागरी प्रचारिणी पत्रिका सन् १९६७—पृ० १६६-६८ २. ” ” ” १६६
- ३७ - मिलाया गया हो । जैसे "जनमी गोरी तू जेसलमेर" : 'गोरड़ी जेसलमेर की' । आबू के परमार भी राजपूताने में फैले हुए थे । अतः राजमती का उनमें से किसी सरदार की कन्या होना सम्भव है । पर भोज के अतिरिक्त और भी नाम इसी प्रकार जोड़े हुए मिलते हैं । जैसे—माघ, भवराज, कवि कालिदास । जैसा पहले कह आये हैं, अजमेर के चौहान बीसलदेव ( विग्रहराज चतुर्थ ) बड़े वीर और प्रतापी थे और उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध कई चढ़ाइयाँ की थीं और कई प्रदेशों को मुसलमानों से खाली कराया था । दिल्ली और हाँसी के प्रदेश इन्होंने अपने राज्य में मिलाये थे । इनके वीर चरित का बहुत कुछ वर्णन इनके राजकवि सोमदेव रचित "ललित विग्रह-राज" ( संस्कृत ) में है, जिसका कुछ अंश बड़ी-बड़ी शिलाओं पर खुदा हुआ मिलता है और राजपूताना म्यूजियम में सुरक्षित है । पर नाहड़ के इस बीसलदेव रासो में, जैसा कि होना चाहिए था, न तो उक्त वीर राजा की ऐतिहासिक चढ़ाइयों का वर्णन है, न उसके शौर्य-पराक्रम का । शृङ्गार रस की दृष्टि से विवाह और रूठकर विदेश जाने का ( प्रोषित पतिका के वर्णन के लिए ) मनमाना वर्णन है । अतः इस छोटी-सी पुस्तक को बीसलदेव जैसे वीर का "रासो" कहना खटकता है । पर हम देखते हैं कि यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं केवल गाने के लिए रचा गया था, तो बहुत कुछ समाधान हो जाता है ।" डा० श्यामसुन्दर दास का मत है कि "विग्रहराज के विषय में दो और शिलालेखों का पता लगा है । पहिले पर तो सोमेश्वरदेव का बनाया हुआ एक नाटक खुदा है जिसमें वसन्तपाल की कन्या के साथ राजा विग्रहराज की प्रेम- केलि और मुसलमानों के विरुद्ध राजा के युद्धों का वर्णन है । दूसरे पर भी एक नाटक है जिसके रचयिता स्वयं विग्रहराज हैं । इस दूसरे शिलालेख पर संवत् १२१० ( ११५३ ई० ) खुदा है । इनसे अब यह स्पष्ट सिद्ध हो गया कि महाराज विग्रहराज का राज्यकाल १२ वीं शताब्दी के मध्य में हुआ । सोमेश्वर राज के समय का एक शिलालेख मेवाड़ में मिला है जिसमें लिखा है कि विग्रहराज अर्णवराज का पुत्र था और 'तस्य ज्येष्ठ भ्रातृपुत्रः पृथ्वी- राजः' था तथा "ज्येष्ठ भ्रातृ" का नाम आगे चलकर सोमेश्वर दिया है । बीसल- देव का नाम भी इस लेख में दिया है । पर विग्रह-राज से तीन पीढ़ी पहिले १. हिन्दी साहित्य का इतिहास-पृ० ३४-३५ । सं० २००३ ।
- १८ - हैं। अतएव यह सिद्ध होता है कि विग्रहराज और बीसलदेव एक ही पुरुष नहीं थे। इसके अतिरिक्त पृथ्वीराजरासा में लिखा है कि जिस समय बीसलदेव गुज- रात के चालुक्य राजा से लड़ने गये तो राजा भोज का लड़का उदयादित्य उनके साथ था। बीसलदेव रासो के अनुसार बीसलदेव ने भोज परमार की कन्या से विवाह किया था और इस भोज का समय डा० राजेन्द्र लाल मित्र के अनुसार सन् १०२१-१०८३ के बीच में होता है—पृथ्वीराजरासो से यह पता चलता है कि बीसलदेव की एक प्रमार वंशीय रानी थी, क्योंकि आदि पर्व में यह दोहा मिलता है :- ऊँच धाम बिसराम किय रहा बाल चतुरङ्ग। क्रीड़ा महल पधौर संवे पदिय सुकथा प्रमङ्ग॥ चन्द बीसलदेव का समय संवत् ८२१ देता है (पण्ड्या जी के सम्मत् विक्रम संवत् के अनुसार यह ६११ होगा) और यह लिखा है कि बीसलदेव ने ६४ वर्ष राज्य किया था। अतएव इस गणना के अनुसार बीसलदेव की मृत्यु का संवत् ९७५ (९१९ ई०) होगा जबकि राजा भोज और उसके पुत्र उदयादित्य का जन्म भी नहीं हुआ था; परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि लेख के भ्रम से यह संवत् ८२१ अशुद्ध छपा है क्योंकि एक-दूसरे स्थान पर चन्द चालुक्य राज पर बीसलदेव की चढ़ाई और गुजरात विजय का समय ९८६ बताता है। इसलिए ऐसा जान पड़ता है कि बीसलदेव का समय ८२१ न होकर ९२१ होगा। यह समय (६२१-९१+६४ = १०७६ या १०२० ई०) भोज और उसके पुत्र उदयादित्य से भी ठीक ठीक मिल जाता है और इन दोनों का समकालीन होना सम्भवत सिद्ध हो जाता है। पण्डित मोहनलाल विष्णुलाल जी पंड्या का कथन है कि राजपूताने की ख्यातियों में १२१ के स्थान पर ६३१ मिलता है। यदि यह संवत् ठीक है तो बीसलदेव का समय १०१० मानना चाहिए। इतिहास में बीसलदेव का नाम इसलिए प्रसिद्ध है कि उसने कई बार मुसलमानों के विरुद्ध लड़ाई ठानी थी और एक बार उन्हें पुन' भारतवर्ष से निकालने में वह सफल मनोरथ हुआ था। इससे उसी युद्ध का आशय है जो राज- पूताने के राजाओं ने मुहम्मद गज़नवी (६६०-१०३०) के विरुद्ध ठाना था और जिसमें ये कृतकार्य हुए थे। जो बातें ऊपर कही गयी हैं इनसे यही सिद्ध होता है कि बीसलदेव बारहवीं शती में नहीं हुआ परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी के
Here is the line-by-line transcription of the text from the image:
- ३५ - प्रथम अङ्क' भाग में। फीरोजशाह की लाट पर जो लेख है उसके विषय में मेरा यह सिद्धान्त है कि यह बीसलदेव ही से कोई स्पष्ट सम्बन्ध नहीं रखता । वरन् उसके नाम का उल्लेख उसमें इसलिए किया गया है कि वह विग्रहराज के प्रतापी और प्रसिद्ध पुरखाओं में से था । चौहानों के इतिहास में बीसलदेव का नाम निजदेश के हितार्थ अनेक साहसपूर्ण कार्यों के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध है। जो दिल्ली न जीत सका उसने समझा हो कि यदि अपने नाम के साथ बीसलदेव के नाम का उल्लेख हो तो जो कालिमा मेरे यश में लग गई है वह दूर हो जाय । इसी कारण इन दोनों का नाम उस शिलालेख पर है। इससे बीसल- देव और विग्रहराज को एक ही पुरुष मानना कदापि उचित नहीं जान पड़ता ।"१ श्री रामनारायण जी दूगड़ ने अपना विचार इस सम्बन्ध में यों प्रकट किया है :- बीसलदेव रासो के विषय में अपनी सम्मति प्रकट करने के पूर्व में बाबू श्यामसुन्दर दास जी के मन्तव्य पर कुछ कहूँगा । उक्त बाबूजी का पृथ्वीराज रासो के बीसलदेव, ललित विग्रह राज नाटक के नायक और फीरोजशाह की लाट के लेख वाले बीसलदेव तथा राजमति के पति बीसल को एक ही पुरुष मान लेना सर्वथा अयुक्त है। उन्होंने टाड राजस्थान के अनुसार रासो वाले बीसलदेव का पृथ्वीराज से ६ पीढ़ी पहिले होना लिखकर उस बीसलदेव के समय को, बीसलदेव रासो के बीसल से मिलाने का परिश्रम उठाया है। यही कारण है कि अन्त में उन्हें लाट पर के लेख वाले विग्रहराज और बीसलदेव जुदा-जुदा पुरुष ठहराने पड़े । यदि उक्त बाबू साहब को यह मालूम होता कि चन्द के रासो और टाड साहब की दी हुई चहुवाणों की वंशावली बिल्कुल रद्दी है और विग्रहराज या बीसलदेव नाम के चार राजा चहुवाणों में हुए हैं तो वे कदापि ऐसा न लिखते । पहिला विग्रहराज या बीसलदेव चहुवाणों के मूल पुरुष चापमान या चाह- मान से पाँचवीं पीढ़ी में हुआ । दूसरा विग्रहराज ( पृथ्वीराज रासो का बीसलदेव ) सिंहराज का पुत्र था, जिसने अणहिल वाड़े के राजा मूलराज सोलंखी को जीतकर वहाँ बीसलपुर नाम का नगर बसाया । पृथ्वीराज रासो में इस बीसलदेव को आनन्ददेव ( अर्णो- राज ) का दादा कहकर सं० ९८६ वि० तक १६२ वर्ष अजमेर में उसका राज १. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, सन् १६०१, पाँचवाँ भाग, पृ० १४१-१४४ ।
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करता मिलता है। परन्तु वास्तव में यह विग्रहराज या बीसलदेव सं० १०३० वि० में राज करता था।^1 बाबू श्यामसुन्दरदास जी ने अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना के सहारे से पृथ्वीराज रासो में दिये हुए सं० में इस बीसलदेव का समय मिलाने का यत्न किया है^2 इस बीसलदेव का मालवे परमार राजा भोजदेव का तो नहीं किन्तु उसके पिता सिन्धुराज का समकालीन होना सम्भव है, क्योंकि भोजदेव सं० १०८० वि० में कुछ पहिले गद्दी पर बैठा था और सं० १११५ या १११६ के लगभग मृत्यु को प्राप्त हुआ या मारा गया। बीसलदेव भोज से पहले मर चुका हो क्योंकि पृथ्वीराज विजय नाम की पुस्तक और शिला लेखों में दी हुई चौहानों की वंशावली के अनुसार सिंहराज के विग्रहराज या बीसलदेव, दुर्लभराज, चन्द्र- राज और गोविन्दराज नाम के पुत्र थे। वास्तव के पीछे दुर्लभ और उसका भाई गोविन्दराज राजा हुआ। गोविन्दराज के पीछे वाक्पतिराज दूसरा और फिर उसके छोटे भाई वीर्यराम की बारी आई। यह वीर्यराम अवन्ती के राजा भोज के हाथ से मारा गया था। वीर्यराम का उत्तराधिकारी दुर्लभराज तीसरा मालवे के राजा उदयादित्य का, 'जिसके लिये लेखों में भोजदेव का सम्बन्धी होना लिखा के हैं,' समकालीन था, जिसने स० ११५१ वि० के निकट तक राज किया। तीसरा विग्रहराज या बीसलदेव दुर्लभराज तीसरे का भाई था जिसका राज सं० ११५१७२ वि० के बीच में होना चाहिए। इसके लिए बिजोल्यां की प्रशस्ति में लिखी है कि धी चण्डी रनिषेति शण सुचर धी सिंहटो घूम्रखस्तद् भ्राता यत सोपि वीसल नृपः धी राजदेवी प्रियः । अर्थात् यही वीसलराज राजमती का पति था। परन्तु यह नहीं कह सकते कि राजदेवी मालवे के राजा भोजदेव ही की कन्या थी। चौथा विग्रहराज या बीसलदेव बिजोल्यां की प्रशस्ति' में इसका नाम वीसल दिया है। 'अर्णोराज' 'आनल्ल देव' का पुत्र और सोमेश्वर का बड़ा भाई था
1 Epigraphia Indica vol II P 119 हर्षनाथ के मंदिर का शीला- घटी प्रान्त में लेख। २ — अनन्द सम्वत् संवत् की कल्पना मोहनलालजी विष्णुलालजी पंड्या ने की है लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिलता। कहीं ६० और कहीं ९१ वर्ष पृथ्वी- राज रासो में दिये हुए संवतों को शुद्ध ठहराने के लिए मिलाए हैं। लेकिन इतने पर भी पृथ्वीराज के सब संवत् ठीक नहीं मिलते।
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जिसका लेख देहली में फीरोज़शाह की लाट पर है¹, उसकी मृत्यु सं० १२२० वि० के लगभग होना उस लेख में पाया जाता है। इसी बीसलदेव या विग्रहराज ने तँवरों से दिल्ली का राज लिया 'सं० १२०८ वि० के लगभग' और हिमालय से विन्ध्याचल पर्यन्त देश विजय कर आर्यावर्त्त से म्लेच्छों का उच्छेद किया था। यही 'ललित विग्रहराज' नाम के नाटक का नायक था।² इस बीसलदेव और उसके लेख के विषय में जो अनुमान बाबू श्यामसुन्दरदास ने किया है, वह ठीक नहीं है। अब बीसलदेव रासो के विषय में यह कहा जा सकता है कि यदि यह ग्रंथ किसी नरपति कवि ने शक सं० १२०२ या १२१० में लिखा हो तो रचयिता ऊपर दिये हुए चारों बीसलदेवों में से किसी का भी समकालीन नहीं ठहरता। ग्रन्थकार लिखता है कि भोजदेव ने अपनी कन्या का विवाह करने को पुरो- हित भेजा, वह अजमेर, अयोध्या, दिल्ली और मथुरा गया परन्तु कोई राजा उसके मन में न आया। आखिर अजमेर के बीसलदेव से उसने राजमती का विवाह ठहराया। भाटियों की ख्याति के अनुसार जैसलमेर का नगर राजा जैसल ने सं० १२१२ वि० में बसा कर अपनी राजधानी बनाया था। अतः सम्भव नहीं कि भोजदेव का पुरोहित जो राव जैसल से करीब एक सौ वर्ष पहले मर चुका था, जैसलमेर में जाता और यदि उसका जैसलमेर जाना मानें तो राजमती को भोजदेव की कन्या नहीं मानना पड़ेगा। भोज राजा के समय में दिल्ली पर अनंगपाल तँवर 'दूसरा' राज करता था, अयोध्या में शालवंशी राजाओं का राज- भ्रष्ट होकर राठौड़ों का अधिकार शुरू हुआ था। मथुरा में उस समय कोई स्वतन्त्र राजा का होना पाया नहीं जाता, यह शहर दिल्ली के अधीन था। फिरिश्तः लिखता है कि (१०१७ ई० सं०) १००४ वि० में सुलतान महमूद गजनवी मथुरा में गया जो किशन वासुदेव का शहर कहलाता है। दिल्ली के राजा ने शहर की हिफ़ाजत के वास्ते फौज भेजी थी मगर वह शिकस्त खाकर भाग गई और बीस दिन तक सुल्तान ने उस शहर को लूटा।³ साँभर में चौहानों का राज भोजदेव से बहुत पहले होना पाया जाता है, चित्तौड़ का गढ़ आठर्वी
1 Indian Antiquary Vol 26 P 216-1860 २-एक ललित विग्रहराज नाटक कवि सोमदेव का बनाया हुआ और दूसरा हर- केलि नाटक खास विग्रहराजजी का बनाया हुआ अजमेर के अढ़ाई दिन के झोपड़े में मिला था।